कोलकाता। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में कुछ ऐसे प्रकाशन हैं जिन्होंने न केवल विचारों को आकार दिया बल्कि पूरे समुदाय को राष्ट्रीय चेतना से जोड़ा। ‘अल-हिलाल’ ऐसी ही एक क्रांतिकारी उर्दू पत्रिका थी जिसने 1912 में मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के संपादकीय नेतृत्व में कोलकाता से प्रकाशन शुरू किया।

साहसिक पत्रकारिता का प्रतीक

मिस्र की प्रसिद्ध पत्रिका से प्रेरित इस साप्ताहिक का उद्देश्य भारतीय मुसलमानों में राष्ट्रीय भावना जागृत करना था। अल-हिलाल केवल एक पत्रिका नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन का माध्यम बनी। इसके पन्नों पर कुरान की शिक्षाओं, इस्लामी इतिहास और समकालीन राजनीतिक मुद्दों का सार्थक विश्लेषण प्रकाशित होता था।

मौलाना आज़ाद की तीक्ष्ण लेखनी और ओजस्वी भाषा शैली ने पत्रिका को असाधारण लोकप्रियता दिलाई। जहां उस दौर में अधिकांश उर्दू पत्रों की प्रसार संख्या कुछ हजार में सीमित थी, वहीं अल-हिलाल की 25,000 प्रतियां बिकती थीं। यह आंकड़ा उस समय के लिए अभूतपूर्व था।

हिंदू-मुस्लिम एकता का संदेशवाहक

अल-हिलाल की विशेषता थी इसका निर्भीक रुख। पत्रिका ने खुलकर ब्रिटिश साम्राज्यवाद का विरोध किया और हिंदू-मुस्लिम एकता पर जोर दिया। इसने मुस्लिम समाज को यह समझाया कि भारत की आज़ादी उनका भी उद्देश्य है और इसमें सभी समुदायों को मिलकर काम करना होगा।

ब्रिटिश दमन और प्रतिबंध

पत्रिका की बढ़ती लोकप्रियता और उग्र राष्ट्रवादी स्वर ने ब्रिटिश सरकार को चिंतित कर दिया। बार-बार जुर्माना लगाने के बाद अंततः 1914 में प्रेस एक्ट के तहत अल-हिलाल पर प्रतिबंध लगा दिया गया। हालांकि पत्रिका का जीवनकाल संक्षिप्त रहा, लेकिन इसका प्रभाव दीर्घकालिक साबित हुआ।

सांप्रदायिक सद्भाव का प्रतीक

आज जब हम स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास को देखते हैं, तो अल-हिलाल उस युग की साहसिक पत्रकारिता और सांप्रदायिक सद्भाव का प्रतीक बनकर उभरती है। मौलाना आज़ाद का यह प्रयास भारतीय मुसलमानों को राष्ट्रीय मुख्यधारा से जोड़ने में महत्वपूर्ण कड़ी साबित हुआ। यह पत्रिका आज भी युवा पत्रकारों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है।