एफआर न्यूज. भोपाल। ताज-उल-मस्जिद भारत की सबसे बड़ी और दुनिया की सबसे बड़ी मस्जिदों में से एक है। इसका नाम फ़ारसी भाषा से लिया गया है, जिसका अर्थ है “मस्जिदों का ताज”। यह मस्जिद खासतौर पर ईद और अन्य इस्लामिक अवसरों पर बड़ी नमाज़ सभाओं के लिए प्रसिद्ध है। मस्जिद के भीतर लगभग 25,000 से 30,000 लोग एक साथ नमाज अदा कर सकते हैं। ईद और जुमे की नमाज के दौरान मस्जिद के प्रांगण और आसपास के खुले मैदानों सहित यह संख्या बढ़कर 1 लाख (100,000) से अधिक हो सकती है।

निर्माण की शुरुआत (19वीं शताब्दी)

ताज-उल-मस्जिद का निर्माण भोपाल की नवाब बेगम शाहजहां (1868-1901) के शासनकाल में प्रारंभ हुआ था।
बेगम शाहजहां, जो भोपाल की तीसरी महिला शासक थीं, इस मस्जिद को दिल्ली की जामा मस्जिद से भी विशाल और भव्य बनाना चाहती थीं।
मस्जिद का निर्माण कार्य मुगल और अफगान स्थापत्य शैली से प्रेरित था।
हालांकि, 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में अंग्रेजों के साथ युद्ध और आर्थिक संकट के कारण इस परियोजना को रोक दिया गया।

निर्माण कार्य का दोबारा आरंभ (20वीं शताब्दी)

मस्जिद का निर्माण 20वीं शताब्दी के मध्य में फिर से शुरू किया गया।
प्रसिद्ध इस्लामी विद्वान मौलाना सैयद हाशिम साहब और अन्य धर्मगुरुओं के प्रयासों से इसका निर्माण कार्य पुनः आरंभ हुआ।
इस कार्य को पूरा करने के लिए विभिन्न इस्लामी संगठनों और स्थानीय लोगों का सहयोग मिला।
अंततः, 1985 में इसे पूरी तरह से एक विशाल मस्जिद के रूप में तैयार किया गया।

मुख्य आकर्षण

1. भव्य मुगल शैली की वास्तुकला
2. विशाल प्रार्थना कक्ष और खूबसूरत मीनारें
3. कुरान की आयतों की सुंदर सुलेखकारी
4. ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व

विशेषताएँ

1. मस्जिद की भव्यता

ताज-उल-मस्जिद लगभग 2330 वर्ग मीटर में फैली हुई है।
इसका मुख्य प्रवेश द्वार बेहद सुंदर है, जिस पर नक्काशीदार मेहराब और कुरान की आयतें अंकित हैं।
इसमें एक बड़ा नमाज हॉल है, जिसकी छत तीन विशाल सफेद गुंबदों से ढकी हुई है।

2. विशाल मीनारें और गुंबद

मस्जिद में दो ऊँची मीनारें (206 फीट ऊँची) हैं, जो गुलाबी पत्थर से बनी हुई हैं।
ये मीनारें दिल्ली की जामा मस्जिद से प्रेरित हैं।
तीन विशाल गुंबद इसकी भव्यता में चार चांद लगाते हैं।

3. जलाशय (तालाब)

मस्जिद के प्रांगण में एक बड़ा जलाशय है, जिसका उपयोग वजू के लिए किया जाता है।
यह जलाशय इस्लामी वास्तुकला के अनुरूप मस्जिद की सुंदरता को बढ़ाता है।

4. इस्लामी शिल्पकला और नक्काशी

मस्जिद के स्तंभों और दीवारों पर खूबसूरत इस्लामी शिल्पकला उकेरी गई है।
संगमरमर की शानदार नक्काशी और कुरान की आयतों की सुलेखकारी इसे और अधिक भव्य बनाती है।

5. मदरसा और धार्मिक शिक्षा

मस्जिद परिसर में एक मदरसा भी संचालित होता है।
यहाँ इस्लामी शिक्षा दी जाती है और कई छात्रों को धार्मिक अध्ययन के लिए तैयार किया जाता है।

सांस्कृतिक महत्व

ताज-उल-मस्जिद सिर्फ एक मस्जिद नहीं है, बल्कि यह भारत के इस्लामी इतिहास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
यह मस्जिद इस्लामी सम्मेलनों और धार्मिक समारोहों के आयोजन का केंद्र भी है।
हर साल यहाँ विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम और शिक्षण कार्यशालाएँ आयोजित की जाती हैं, जिसमें देश-विदेश से विद्वान और अकीदतमंद हिस्सा लेते हैं।
आज के दौर में, ताज-उल-मस्जिद न केवल एक ऐतिहासिक धरोहर है, बल्कि यह पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। भोपाल आने वाले पर्यटक इस भव्य मस्जिद को देखने अवश्य आते हैं।

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