नई दिल्ली। देश के स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्र निर्माण में मुस्लिम योद्धाओं की भूमिका को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। सामाजिक और बौद्धिक वर्गों में यह सवाल उठ रहा है कि जिन मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों ने देश के लिए अपने प्राण न्यौछावर किए, उनकी देशभक्ति पर बार-बार सवाल क्यों खड़े किए जाते हैं। इतिहास गवाह है कि अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह ज़फर ने अंग्रेज़ों के खिलाफ विद्रोह का नेतृत्व किया और अपने बेटों की निर्मम हत्या के बावजूद झुके नहीं। मैसूर के शेर टीपू सुल्तान ने अंग्रेज़ी हुकूमत से आखिरी सांस तक लड़ाई लड़ी और शहीद हुए। बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला ने भी विदेशी ताकतों के खिलाफ संघर्ष किया। इन बलिदानों को आज भी देशभक्ति की मिसाल माना जाता है। इसके बावजूद कुछ संगठनों और विचारधाराओं द्वारा मुस्लिम समुदाय की वतनपरस्ती पर सवाल उठाए जाने को लेकर असंतोष बढ़ रहा है।

किसी एक समुदाय की निष्ठा पर संदेह करना अनुचित

कई बुद्धिजीवियों का कहना है कि देश की आज़ादी और विकास में सभी धर्मों और वर्गों का योगदान रहा है, इसलिए किसी एक समुदाय की निष्ठा पर संदेह करना अनुचित है। साथ ही यह भी मांग उठी है कि राष्ट्रवाद के नाम पर राजनीति करने वाले संगठनों को अपने ऐतिहासिक योगदान और सामाजिक भूमिका स्पष्ट करनी चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि आज जरूरत देश में आपसी सौहार्द, एकता और भाईचारे को मजबूत करने की है, न कि विभाजनकारी बहसों को बढ़ावा देने की। विश्लेषकों के अनुसार, स्वतंत्रता संग्राम के नायकों की कुर्बानियों को धर्म के आधार पर नहीं, बल्कि राष्ट्रहित के संदर्भ में याद किया जाना चाहिए। यही सच्ची कुर्बानी होगी।

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