एफआर न्यूज. नई दिल्ली। देश में पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। वर्ष 2025 में अब तक कई पत्रकारों को सच उजागर करने की भारी कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी है। ये मामले मीडियाकर्मियों के सामने आने वाले खतरों और उनकी सुरक्षा की चिंताजनक स्थिति को उजागर करते हैं।
मुकेश चंद्राकर: भ्रष्टाचार की रिपोर्टिंग की कीमत
छत्तीसगढ़ के 33 वर्षीय फ्रीलांस पत्रकार मुकेश चंद्राकर एक जनवरी को लापता हो गए थे। दो दिन बाद उनका शव एक सेप्टिक टैंक में मिला। यह टैंक उसी ठेकेदार से जुड़ा था, जिसके खिलाफ मुकेश ने भ्रष्टाचार की खोजी रिपोर्ट प्रकाशित की थी। यह मामला पत्रकारिता में खोजी रिपोर्टिंग के खतरों को रेखांकित करता है।
धर्मेंद्र सिंह चौहान का दर्दनाक अंत
आरटीआई कार्यकर्ता और पत्रकार धर्मेंद्र सिंह चौहान की 18 मई को हरियाणा के झज्जर में उनके घर के पास सिर में गोली मारकर हत्या कर दी गई। वह सूचना के अधिकार के माध्यम से भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाते थे।
राघवेंद्र बाजपेयी और राजीव प्रताप
उत्तर प्रदेश के सीतापुर में आठ मार्च को पत्रकार राघवेंद्र बाजपेयी की गोली मारकर हत्या कर दी गई। पुलिस के अनुसार, उन्होंने एक नाबालिग के यौन शोषण को देख लिया था। वही सितंबर में 36 वर्षीय यूट्यूब पत्रकार राजीव प्रताप नौ दिनों तक लापता रहे, जिसके बाद उनकी लाश एक डैम में मिली। परिवार ने हत्या की आशंका जताई, लेकिन एसआईटी ने इसे सड़क दुर्घटना बताया।
ओडिशा में नरेश की हत्या: डिजिटल पोर्टल ‘टाइम्स ओड़िआ’ के पत्रकार नरेश कुमार पर जुलाई में ओडिशा के मलकानगिरी में अज्ञात लोगों ने धारदार हथियारों से हमला किया, जिससे उनकी मौत हो गई।
चिंताजनक स्थिति
पत्रकार संगठनों ने इन घटनाओं पर गंभीर चिंता जताई है और सरकार से मीडियाकर्मियों की सुरक्षा के लिए ठोस कदम उठाने की मांग की है। विशेषज्ञों का कहना है कि खोजी पत्रकारिता और भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वाले पत्रकारों को विशेष सुरक्षा की आवश्यकता है। ये घटनाएं प्रेस की स्वतंत्रता और लोकतंत्र की चौथी स्तंभ की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं।
