मुहम्मद फारुख पहाड़ियान
एडिटर इन चीफ, फ्राइडे संवाद

दिल्ली दंगा 2020 से जुड़े कथित साज़िश मामले में सुप्रीम कोर्ट का ताज़ा फैसला देश की न्यायिक प्रक्रिया, नागरिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों के संवैधानिक अधिकारों पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े करता है। एक ओर जहां गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को सशर्त ज़मानत देकर अदालत ने राहत दी, वहीं उमर ख़ालिद और शरजील इमाम को ज़मानत से इनकार कर दिया गया। यह फैसला केवल कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक बहस का विषय भी बन गया है।

अनुच्छेद 21 हर नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है

सबसे पहले उन पांच लोगों की रिहाई पर बात ज़रूरी है जिन्हें वर्षों बाद जेल से बाहर आने की उम्मीद मिली। ये सभी लोग लगभग पांच साल से अधिक समय से विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में बंद थे। संविधान का अनुच्छेद 21 हर नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। लंबे समय तक बिना दोष सिद्ध हुए जेल में रखना अपने आप में इस अधिकार का हनन है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा इनकी ज़मानत यह स्वीकार करती है कि न्याय केवल सज़ा देने का माध्यम नहीं, बल्कि स्वतंत्रता की रक्षा का भी औज़ार है। यह राहत देर से सही, लेकिन न्यायिक संतुलन की ओर एक सकारात्मक कदम मानी जानी चाहिए।हालांकि, अदालत द्वारा यह कहना कि “ज़मानत का मतलब आरोपों की गंभीरता कम होना नहीं है”, यह दर्शाता है कि सिस्टम अब भी इन लोगों को संदेह की नज़र से देखता है। बावजूद इसके, यह ज़मानत उन सैकड़ों परिवारों के लिए उम्मीद की किरण है, जो वर्षों से ‘तारीख पर तारीख’ और अनिश्चित भविष्य के बीच जी रहे थे।

दोनों पिछले पांच साल से अधिक समय से जेल में हैं

लेकिन असली सवाल उमर ख़ालिद और शरजील इमाम की ज़मानत खारिज होने को लेकर है। दोनों पिछले पांच साल से अधिक समय से जेल में हैं, ट्रायल अभी भी अधूरा है और दोष सिद्ध नहीं हुआ है। ऐसे में “ज़मानत नियम, जेल अपवाद” का सिद्धांत यहां क्यों लागू नहीं हुआ? अदालत ने UAPA की धारा 43D(5) का हवाला देते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया आरोप गंभीर हैं। लेकिन क्या “प्रथम दृष्टया” के आधार पर किसी व्यक्ति को अनिश्चित काल तक जेल में रखा जाना न्यायसंगत है? यह कोई साधारण आपराधिक मामला नहीं, बल्कि ऐसा केस है जहां UAPA जैसे कठोर कानून का इस्तेमाल किया गया है। यह कानून अपने सख्त प्रावधानों के कारण पहले भी आलोचनाओं के घेरे में रहा है। सवाल यह है कि क्या UAPA अब सज़ा देने का औज़ार बनता जा रहा है, जबकि दोष साबित होना अभी बाकी है? लंबी हिरासत को “राष्ट्रीय सुरक्षा” के नाम पर जायज़ ठहराना क्या संविधान की मूल भावना के खिलाफ नहीं जाता?

आकलन ट्रायल से पहले कैसे तय हो सकता है?

उमर ख़ालिद और शरजील इमाम के मामले में अदालत ने कहा कि उनकी भूमिका “केंद्रीय” और “अलग प्रकृति” की है। लेकिन यह आकलन ट्रायल से पहले कैसे तय हो सकता है? क्या भाषण, असहमति या सरकार की नीतियों की आलोचना को साज़िश का रूप देना लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत नहीं है? अगर विचार और अभिव्यक्ति ही अपराध बन जाएं, तो फिर लोकतंत्र का अर्थ क्या रह जाएगा? यह भी ध्यान देने योग्य है कि सुप्रीम कोर्ट ने खुद यह रास्ता खुला रखा है कि एक साल बाद या मुख्य गवाहों की गवाही के बाद वे फिर ज़मानत मांग सकते हैं। यह स्वीकारोक्ति है कि मुकदमे में देरी एक वास्तविक समस्या है। लेकिन सवाल यह है कि जब देरी सिस्टम की है, तो उसकी कीमत आरोपी क्यों चुकाए?
फ्राइडे संवाद मानता है कि दिल्ली दंगों में हुई हिंसा निंदनीय थी और हर पीड़ित को न्याय मिलना चाहिए। लेकिन न्याय का मतलब यह नहीं कि कुछ लोगों को उदाहरण बनाकर वर्षों तक जेल में रखा जाए, जबकि दोष सिद्ध न हुआ हो। इंसाफ का तकाज़ा यह है कि कानून सबके लिए बराबर हो, चाहे वह सत्ता के पक्ष में हो या उसके आलोचक।

जो रिहा हुए हैं, उनके लिए यह आज़ादी एक नई शुरुआत

जो रिहा हुए हैं, उनके लिए यह आज़ादी एक नई शुरुआत है, लेकिन जिनकी रिहाई नहीं हुई, उनके लिए यह फैसला एक गहरी निराशा है। फिर भी, उम्मीद ज़िंदा रहनी चाहिए—न्यायपालिका से, संविधान से और उस लोकतांत्रिक चेतना से, जो इस देश की आत्मा है। आज ज़रूरत है कि हम यह सवाल पूछें: क्या हम एक ऐसे भारत की ओर बढ़ रहे हैं, जहां क़ानून का इस्तेमाल सुरक्षा के लिए कम और असहमति को दबाने के लिए ज़्यादा हो रहा है? अगर हां, तो यह केवल उमर ख़ालिद और शरजील इमाम का मामला नहीं, बल्कि हर उस नागरिक का सवाल है जो संविधान पर भरोसा करता है।