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दीन- दुनिया

फितना-ए-सामरी: बनी इसराईल की कड़ी परीक्षा

By Friday Sanwad
January 9, 2026 3 Min Read
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फ्राइडे संवाद | विशेष रिपोर्ट

क़ुरआन मजीद में बनी इसराईल की जिस आज़माइश का विस्तार से ज़िक्र मिलता है, वह फितना-ए-सामरी का वाक़िया है। यह घटना न केवल उस दौर की क़ौम के लिए बल्कि क़ियामत तक आने वाले इंसानों के लिए एक अहम सबक है। इस वाक़िये का उल्लेख क़ुरआन की सूरह अल-आ‘राफ़ और सूरह ताहा में मिलता है, जो इसे पूरी तरह प्रामाणिक बनाता है। क़ुरआन के मुताबिक रब ने हज़रत मूसा (अ.स.) को तौरेत अता करने के लिए कोह-ए-तूर पर बुलाया और चालीस रातों का वक़्त मुक़र्रर किया। हज़रत मूसा (अ.स.) अपनी क़ौम को हज़रत हारून (अ.स.) के सुपुर्द कर जल्दी रब की बारगाह में हाज़िर हुए। रब ने उनसे फ़रमाया: “तुम अपनी क़ौम को पीछे छोड़कर इतनी जल्दी क्यों आ गए?” हज़रत मूसा (अ.स.) ने अर्ज़ किया कि वे रब की रज़ा पाने की जल्दी में आए हैं और उनकी क़ौम पीछे आ रही है। तब रब ने फ़रमाया कि उनकी ग़ैर-मौजूदगी में बनी इसराईल को आज़माइश में डाल दिया गया है और सामरी ने उन्हें गुमराह कर दिया है।

बछड़ा न बोल सकता था, न किसी को नफ़ा या नुक़सान पहुँचा सकता था

सामरी ने क़ौम से सोने-चांदी के ज़ेवर इकट्ठा कर आग में डाले और उनसे एक बछड़े की शक्ल तैयार की, जिसमें से आवाज़ निकलती थी। बनी इसराईल धोखे में आ गए और कहने लगे: “यही तुम्हारा भी माबूद है और मूसा का भी, मगर मूसा भूल गए।” हालाँकि यह बछड़ा न बोल सकता था, न किसी सवाल का जवाब दे सकता था और न ही किसी को नफ़ा या नुक़सान पहुँचा सकता था। क़ुरआन इस पर सवाल उठाता है कि क्या वे यह नहीं देखते थे कि वह न उनकी बात सुनता है और न उन्हें रास्ता दिखाता है? इस दौरान हज़रत हारून (अ.स.) ने पूरी कोशिश की कि क़ौम को इस गुमराही से बचाया जाए। उन्होंने साफ़ कहा:
“ऐ मेरी क़ौम! तुम इसकी वजह से फ़ितने में डाल दिए गए हो, तुम्हारा पालनहार तो सिर्फ़ रहमान है, उसी की इबादत करो और मेरी पैरवी करो।” लेकिन क़ौम ने हठधर्मी दिखाई और कहा कि जब तक हज़रत मूसा (अ.स.) वापस नहीं आ जाते, वे उसी की पूजा करते रहेंगे।

वाक़िया आज के दौर के लिए भी

जब हज़रत मूसा (अ.स.) लौटे तो वे ग़ुस्से और गहरे अफ़सोस की हालत में थे। उन्होंने अपनी क़ौम को सख़्त लहजे में नसीहत की और हज़रत हारून (अ.स.) से पूछा कि उन्होंने उन्हें क्यों नहीं रोका। हज़रत हारून (अ.स.) ने जवाब दिया कि उन्हें डर था कहीं क़ौम आपस में बँट न जाए। इसके बाद हज़रत मूसा (अ.स.) ने सामरी से सवाल किया और उसे सख़्त सज़ा सुनाई। क़ुरआन के अनुसार सामरी को समाज से अलग कर दिया गया और क़यामत तक उसके अंजाम की चेतावनी दी गई।
उलेमा के अनुसार यह वाक़िया आज के दौर के लिए भी एक ज़बरदस्त पैग़ाम रखता है कि जब नबी या सही रहनुमा नज़र न आए, तब भी तौहीद, सब्र और अल्लाह की इताअत से हटना इंसान को गुमराही में डाल देता है। फितना-ए-सामरी हमें यह सिखाता है कि ज़ाहिरी चमत्कार नहीं, बल्कि हक़ और वही इंसान की असली रहनुमाई है।

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