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दीन- दुनिया

ध्वनि का दिमाग पर प्रभाव, संगीत के दुष्प्रभाव और इस्लामी नजरिया

By Friday Sanwad
February 5, 2026 2 Min Read
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जयपुर। ध्वनि केवल सुनने का साधन नहीं, बल्कि यह सीधे इंसान के दिमाग, व्यवहार और भावनाओं को प्रभावित करने वाली ताकत है। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि कोई भी आवाज या संगीत हमारे मस्तिष्क के लिम्बिक सिस्टम पर असर डालता है, जो भावनाओं और याददाश्त का केंद्र होता है। यही वजह है कि कोई गाना हमें खुशी देता है, तो कोई धुन उदासी या तनाव पैदा कर देती है। तेज आवाज, शोर या लगातार नकारात्मक कंटेंट सुनने से दिमाग पर दबाव बढ़ता है और व्यक्ति चिड़चिड़ापन, चिंता व अवसाद जैसी समस्याओं का शिकार हो सकता है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, अत्यधिक संगीत सुनने और हेडफोन के लंबे इस्तेमाल से सुनने की क्षमता कमजोर होना, नींद की कमी, ध्यान भटकना, पढ़ाई में गिरावट, मानसिक थकान और आक्रामक व्यवहार जैसे दुष्प्रभाव सामने आते हैं। खासकर युवाओं में यह लत बनकर समय और ऊर्जा की बर्बादी का कारण बन रहा है।

संगीत इंसान को गफलत और गुनाह की ओर ले जा सकता है

इब्न तैमिय्या का कथन ‘संगीत आत्मा की मदिरा है’ इस बात की ओर संकेत करता है कि संगीत मन पर गहरा प्रभाव डालता है। इसकी अधिक लत ध्यान भटकाव, समय की बर्बादी और भावनात्मक निर्भरता जैसे दुष्प्रभाव भी पैदा कर सकती है।
ध्वनि और संगीत को लेकर इस्लाम में स्पष्ट मार्गदर्शन मिलता है। कई इस्लामी विद्वान अनावश्यक और भटकाने वाले संगीत से बचने की सलाह देते हैं। हदीस शरीफ में आता है: “मेरी उम्मत में कुछ लोग ऐसे होंगे जो ज़िना, रेशम, शराब और माज़िफ़ (वाद्य यंत्र/संगीत) को हलाल समझ लेंगे।” उलेमा इस हदीस के आधार पर कहते हैं कि संगीत इंसान को गफलत और गुनाह की ओर ले जा सकता है। इसके विपरीत, कुरआन की तिलावत, अज़ान और ज़िक्र को दिल को सुकून देने वाला बताया गया है। धार्मिक जानकारों का मानना है कि सकारात्मक और रूहानी आवाजें मानसिक शांति देती हैं, जबकि तेज और उत्तेजक संगीत दिल व दिमाग को बेचैन कर सकता है।
विशेषज्ञों का सुझाव है कि लोग अपने सुनने की आदतों पर नियंत्रण रखें, फायदेमंद और सुकून देने वाली ध्वनियों को अपनाएं। संतुलित जीवनशैली और सही कंटेंट ही मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य का आधार बन सकता है।

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