इन्सान की ज़िंदगी में अगर सबसे क़ीमती कोई चीज़ है तो वह है सुकून। हर शख्स दौलत, शोहरत, कामयाबी और आराम इसलिए चाहता है ताकि उसे दिल का चैन मिल सके। मगर हक़ीक़त यह है कि आज के दौर में तमाम तरक्कियों के बावजूद इंसान बेचैन है। मॉर्डन तकनीक, आलीशान घर, महंगी गाड़ियां और हर तरह की सहूलियतें मौजूद हैं, लेकिन दिलों में इत्मिनान नहीं है। हंसी-खुशी के माहौल के बीच भी अंदर एक खालीपन महसूस होता है। इसकी वजह यह है कि इंसान अपनी रूह को दुनिया की फानी और मामूली चीज़ों से खुश करना चाहता है, जबकि रूह की ज़रूरत इससे कहीं ऊंची है। अंग्रेज़ फ़िलॉसफ़र Julian of Norwich ने कहा था कि हमारी रूह उन चीज़ों में सुकून नहीं पा सकती जो उससे दर्जे में कमतर हों। इंसान को अशरफ़ुल मख़लूक़ात बनाया गया है और उसके ऊपर सिर्फ़ उसका ख़ालिक है। जब तक इंसान अपने रब की पहचान नहीं करता और उसकी याद से रिश्ता मजबूत नहीं करता, तब तक असली सुकून हासिल नहीं होता। सच्चा चैन दौलत या दुनिया से नहीं, बल्कि परवरदिगार की याद और उससे जुड़ाव से मिलता है। यही वह रास्ता है जो दिल को हक़ीक़ी इत्मिनान देता है।