इस्लाम के पाँच बुनियादी अरकान में से एक जकात महज एक धार्मिक फरीज़ा नहीं, बल्कि समाज में आर्थिक संतुलन कायम करने का रब का दिया हुआ निज़ाम है। पवित्र कुरआन में खालिक ओ मालिक ने साफ तौर पर फरमाया है कि जकात केवल आठ मदों में खर्च की जा सकती है — न उससे कम, न उससे ज़्यादा। रसूल(स.अ.व) ने फरमाया, “सदका (जकात) फकीरों, मिस्कीनों और उन लोगों के लिए है जो इसके काम पर लगाए गए हों।” हज़रत अबू हुरैरह रज़ि. से रिवायत है कि नबी(स.अ.व) ने इन आठों श्रेणियों को विस्तार से बयान फरमाया।
जकात के आठ मुस्तहिक (हकदार):
1. फकीर: जिसके पास निसाब से कम माल हो और गुज़ारा मुश्किल हो।
2. मिस्कीन: जिसकी बुनियादी ज़रूरतें भी पूरी न हों, जो खामोशी से तकलीफ उठाए।
3. आमिल: जकात जमा करने और वितरण का काम करने वाले अधिकारी।
4. मुअल्लफ़-ए-कुलूब: नए मुसलमान या वे लोग जिनके दिलों को इस्लाम की तरफ मायल किया जाना हो।
5. रकाबा: गुलामों की आज़ादी के लिए (दासता उन्मूलन)।
6. गारिम: कर्ज़दार जो अपना कर्ज़ उतारने में असमर्थ हो।
7. फी सबीलिल्लाह: रब के रास्ते में — दीनी तालीम, दावत और जायज़ जिहाद के लिए।
8. इब्नुस्सबील: सफर में फंसा मुसाफिर जिसके पास घर लौटने का ज़रिया न हो।
आलिमों के मुताबिक जकात इन्हीं आठ मदों तक सीमित है और गलत हाथों में देने पर फर्ज़ अदा नहीं होती — दोबारा देनी होगी।रमज़ान-उल-मुबारक के महीने में जकात की अहमियत और बढ़ जाती है। राजस्थान समेत पूरे देश में उलमा और इस्लामी संस्थाएँ मुसलमानों से अपील कर रही हैं कि वे जकात की रकम सही मुस्तहिकों तक पहुँचाएं। आलिमों का कहना है कि साहिह हदीस पर अमल करते हुए जकात अदा करने से न केवल माल में बरकत होती है, बल्कि समाज में गरीबी और बेरोजगारी भी कम होती है।
इस्लामी अर्थव्यवस्था के जानकार बताते हैं कि अगर हर साहिब-ए-निसाब मुसलमान सही तरीके से जकात अदा करे, तो मुस्लिम समाज की तस्वीर बदल सकती है। जकात दरअसल अमीर और गरीब के बीच कड़ी है जो भाईचारे और इंसानी हमदर्दी को मज़बूत करता है।
