सैफुल्लाह हज़रत खालिद बिन वलीदؓ: इस्लाम के महान सिपहसालार की कहानी
फ्राइडे संवाद. दीनी । इस्लामी इतिहास में हज़रत खालिद बिन वलीदؓ का नाम साहस, रणनीति और रब के प्रति समर्पण के लिए हमेशा याद किया जाता है। उन्हें नबी-ए-करीम (स.अ.व) ने “सैफुल्लाह” यानी खुदा की तलवार की उपाधि दी। उनकी जिंदगी इस बात की मिसाल है कि इंसान अपनी पिछली गलतियों को छोड़कर सच्चाई को स्वीकार करे तो उसकी पूरी जिंदगी बदल सकती है। इस्लाम स्वीकार करने से पहले खालिद बिन वलीदؓ मुसलमानों के विरोधी पक्ष में थे और ग़ज़वा-ए-उहुद में उनकी सैन्य रणनीति ने युद्ध की दिशा बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लेकिन समय के साथ उनके दिल में इस्लाम की सच्चाई गहराती गई। आखिरकार उन्होंने मदीना जाकर नबी के हाथ पर इस्लाम स्वीकार किया। उनके इस्लाम लाने पर मोहम्मद(स.अ.व.) ने उनका स्वागत किया और उनके लिए मगफिरत की दुआ की। इस्लाम स्वीकार करने के बाद वही खालिदؓ, जो कभी मुसलमानों के खिलाफ तलवार उठाते थे, इस्लाम के महान रक्षक बन गए। ग़ज़वा-ए-मुता में जब एक के बाद एक मुस्लिम सेनापति शहीद हुए तो खालिदؓ ने सेना की कमान संभाली। उन्होंने कठिन परिस्थितियों में अपनी सैन्य रणनीति से मुस्लिम सेना को भारी नुकसान से बचाते हुए सुरक्षित निकाला। इसी अवसर पर नबी ने उन्हें सैफुल्लाह कहा।
जिंदगी का सबसे प्रेरणादायक पहलू केवल उनकी बहादुरी नहीं थी
बाद के वर्षों में खालिदؓ ने कई महत्वपूर्ण अभियानों में हिस्सा लिया। मक्का की विजय, हुनैन और फिर इराक तथा शाम के मोर्चों पर उनकी सैन्य क्षमता सामने आई। यर्मूक की लड़ाई में भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और रोमन सेना के विरुद्ध मुस्लिम सेना की रणनीति में योगदान दिया। उनके साहस और युद्ध-कौशल का प्रभाव विरोधियों पर भी पड़ा। लेकिन हज़रत खालिद बिन वलीदؓ की जिंदगी का सबसे प्रेरणादायक पहलू केवल उनकी बहादुरी नहीं, बल्कि उनकी आज्ञाकारिता और विनम्रता थी। अमीरुल मोमिनीन हज़रत उमर फारूक़ؓ ने उन्हें सेना की कमान से हटा दिया। इसके बावजूद खालिदؓ ने इस फैसले का विरोध नहीं किया और एक सामान्य सैनिक की तरह इस्लामी सेना में अपनी सेवाएं जारी रखीं।
जब उनसे पूछा गया कि उन्होंने इस फैसले को इतनी सहजता से कैसे स्वीकार किया, तो उनके व्यवहार ने स्पष्ट कर दिया कि उनका उद्देश्य पद या प्रसिद्धि नहीं था। वे रब की राह में सेवा करना चाहते थे। हज़रत उमर(रजि.) ने भी स्पष्ट किया कि खालिदؓ को किसी अपराध की सजा के तौर पर नहीं हटाया गया था, बल्कि यह आशंका दूर करना उद्देश्य था कि लोग विजय का श्रेय किसी एक व्यक्ति को देने लगें।
जिंदगी के अंतिम दिनों में खालिदؓ ने अपने शरीर पर युद्धों के असंख्य घावों के निशान होने के बावजूद बिस्तर पर मौत आने का अफसोस व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि उन्होंने शहादत की तलाश में अनेक युद्ध लड़े, लेकिन उनके लिए शहादत का मैदान नहीं, बल्कि बीमारी और बिस्तर की मौत लिखी गई। हज़रत खालिद बिन वलीदؓ की पूरी जिंदगी हमें साहस के साथ-साथ ईमान, अनुशासन, विनम्रता और नेतृत्व के प्रति आज्ञाकारिता का सबक देती है। एक ऐसा व्यक्ति जिसने कभी इस्लाम का मुकाबला किया, बाद में उसी दीन का महान सिपहसालार बना और इतिहास में हमेशा के लिए सैफुल्लाह के नाम से अमर हो गया।