इबादत: आदत नहीं, जिंदगी बदलने का जरिया
इबादत का मकसद केवल नमाज पढ़ना, रोजा रखना या कुछ धार्मिक कार्यों को पूरा करना नहीं है, बल्कि अपनी जिंदगी को रब की बताई राह के मुताबिक ढालना भी है। परवरदिगार ने इंसान और जिन्न को अपनी इबादत के लिए पैदा किया है और इबादत के कुछ तकाजे भी तय किए हैं। इन तकाजों को पूरा करते हुए इबादत करना जरूरी है। आज जरूरत इस बात को समझने की है कि कहीं हमने इबादत को महज एक आदत तो नहीं बना लिया है। हम नमाज तो पढ़ते हैं, लेकिन रास्तों को तंग करते हैं। सजदे में सिर तो झुकाते हैं, लेकिन दूसरों का हक मारते हैं। इबादत भी करते हैं और झूठ बोलकर व्यापार भी करते हैं। नमाज अदा करते हैं, मगर रिश्तों को तोड़ते हैं और लोगों के साथ गलत व्यवहार करते हैं। अगर हमारी इबादत हमें बुराइयों से दूर रहने, सच्चाई अपनाने और दूसरों के अधिकारों का सम्मान करने की प्रेरणा नहीं दे रही है, तो हमें अपनी इबादत और अपने आचरण का जायजा लेना चाहिए।
दीन में रब के अधिकार और उसके बंदों के अधिकार, दोनों की अहमियत है। हकुकुल्लाह का संबंध बंदे और उसके परवरदिगार के बीच के मामले से है। इसमें माफी और पकड़ का फैसला खुदा की मर्जी पर है। वहीं हकुकुल इबाद का संबंध इंसानों के आपसी व्यवहार, अधिकारों और जिम्मेदारियों से है। किसी का हक मारना, किसी को तकलीफ देना, धोखा करना या किसी पर जुल्म करना ऐसे मामले हैं, जिनकी जवाबदेही से बचना आसान नहीं है।
इसलिए जरूरी है कि हम इबादत के साथ अपने व्यवहार को भी बेहतर बनाएं। नमाज के साथ ईमानदारी, रोजे के साथ संयम, इबादत के साथ इंसाफ और दीन के साथ इंसानियत को अपनी जिंदगी का हिस्सा बनाएं।
रब हमें ऐसी इबादत करने की तौफीक अता फरमाए, जो हमारे किरदार को बेहतर बनाए, हमें बुराइयों से बचाए और उसके बंदों के हक अदा करने वाला बनाए। आमीन।