भारत के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो सिर्फ एक शख्सियत नहीं बल्कि एक तहरीक (आंदोलन) बन जाते हैं — उन्हीं में से एक नाम है सर सैयद अहमद खान रहमतुल्लाह अलैह। उन्होंने न सिर्फ़ एक कौम को अंधकार से रोशनी की ओर ले जाने का काम किया, बल्कि पूरे हिंदुस्तान को आधुनिक तालीम और तरक्की की राह दिखाई। 1817 में दिल्ली में जन्मे सर सैयद ने एक ऐसे दौर में आंखें खोलीं जब मुल्क 1857 के गदर के बाद टूटे हुए हालातों से गुजर रहा था। मुसलमान मायूसी, पिछड़ेपन और तालीमी पसमांदगी के शिकार थे। ऐसे हालात में सर सैयद ने इल्म, तहज़ीब और हकीकत पसंदी का मशाल जलाया। उन्होंने समझा कि किसी भी कौम की असली ताकत तालीम और अख़लाक (शिक्षा और चरित्र) है। इसलिए उन्होंने शिक्षा को अपने मिशन का केंद्र बनाया। 1875 में उन्होंने मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज की नींव रखी, जो बाद में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) के नाम से जानी गई। यह यूनिवर्सिटी आज भी उनकी दूरदर्शी सोच की जीती-जागती मिसाल है। सर सैयद ने तालीम को “दीन और दुनिया दोनों के मेल” के रूप में देखा। उनका मानना था कि सिर्फ धार्मिक ज्ञान या सिर्फ आधुनिक विज्ञान किसी समाज को मुकम्मल नहीं बना सकता — बल्कि दोनों का संतुलन ही असली तरक्की की कुंजी है।
उनकी सोच सिर्फ शिक्षा तक सीमित नहीं थी। उन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता, आपसी मोहब्बत और रवादारी को भारत की बुनियाद बताया। उन्होंने कहा था कि “हिंदू और मुसलमान इस मुल्क की दो खूबसूरत आंखें हैं — अगर एक आंख को नुकसान पहुंचे तो मुल्क की नजर कमजोर हो जाएगी।” सर सैयद की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि उन्होंने वक्त की हकीकत को पहचाना और उसी के मुताबिक अपनी रणनीति बनाई। उन्होंने हर हाल में टकराव से बचने, समझदारी से काम लेने और तालीम को हथियार बनाने की बात की। उन्होंने धार्मिक विचारों में भी गहराई से सोचने और कुरान व सुन्नत की रोशनी में नए सिरे से समझ विकसित करने की जरूरत महसूस की।
आज जब हम सर सैयद को याद करते हैं, तो यह सिर्फ एक तारीख या रस्म नहीं होती — बल्कि उनकी सोच को अपनाने का संकल्प होता है। उनके बताए हुए पाँच उसूल — शिक्षा, चरित्र, सद्भाव, हकीकत पसंदी और दीन की सही समझ — आज भी हमारे लिए मशाल-ए-राह हैं।
सर सैयद अहमद खान ने हमें यह सिखाया कि अगर कोई कौम अपनी हालत बदलना चाहती है, तो उसे सबसे पहले अपनी सोच, अपने अखलाक और अपनी तालीम को बदलना होगा। ए मेरे मोहसिन-ए-मिल्लत, तेरी अजमत को सलाम, तेरा पैग़ाम आज भी हमारे दिलों में उजाला करता है।
(लेखक शरफुद्दीन बैग अलीग जयपुर — 9468787785)