इस्लामी इतिहास में मुहद्दिसीन (हदीस के विद्वानों) की मेहनत, लगन और याददाश्त की मिसालें आज भी हैरतअंगेज हैं। वे सिर्फ हदीसें लिखते ही नहीं थे, बल्कि उन्हें याद भी करते थे ताकि आगे आने वाली पीढ़ियों तक सही तरीके से पहुंचा सकें। इसी फजीलत के बारे में पैगंबर मुहम्मद (स.अ.व) ने फरमाया – “परवरदिगार उस व्यक्ति को तरोताजा रखे जो हमसे हदीस सुने, उसे याद रखे और दूसरों तक पहुंचाए।” इमाम शाफई र.अ. ने बताया कि उन्होंने मुआत्ता नामक पूरी हदीस की किताब बचपन में, बालिग होने से पहले ही याद कर ली थी। ये किताब उनके उस्ताद इमाम मालिक की थी। यह दिखाता है कि मुहद्दिसीन सिर्फ पाठक नहीं, बल्कि जीवित यादगार थे।

इमाम बुखारी का मशहूर किस्सा

सबसे मशहूर किस्सा इमाम बुखारी का है। जब वे बगदाद पहुंचे, तो वहां के विद्वानों ने उनकी परीक्षा लेने की ठानी। सौ हदीसों की सनद (श्रृंखला) और मतन (वाक्य) को आपस में मिला-जुला कर उनके सामने रखा गया। हर सवाल पर इमाम बुखारी ने कहा – “ला आरिफु” यानी “मैं नहीं पहचानता।” भीड़ को लगा कि वे अनभिज्ञ हैं। लेकिन जब सबकी बातें पूरी हो गईं, तो उन्होंने एक-एक हदीस को उसकी सही सनद और मतन के साथ बयान किया, ठीक उसी क्रम में जिस क्रम से उन्हें गलत रूप में बताया गया था। इब्न हजर के अनुसार, इमाम बुखारी जैसे हाफ़िज़ को एक लाख से अधिक हदीसें याद थीं — वह भी पूरी सनद के साथ। उनकी इल्म के प्रति समर्पण इस बात का सबूत है कि इस्लामी विद्वान किस गहराई और ईमानदारी से ज्ञान की हिफाज़त करते थे। यह वाक्या बताता है कि इल्म केवल पढ़ने से नहीं, बल्कि खुद को पूरी तरह समर्पित करने से हासिल होता है — जैसा कि इमाम बुखारी और उनके समकालीन मुहद्दिसीन ने कर दिखाया।