गोटवेदा: संदीप मीणा ने बकरी के दूध से बनाए प्रोडक्ट्स, टर्नओवर पहुंचा ₹18 लाख
जयपुर के पास जोबनेर के डूंगरीकलां गांव के 25 वर्षीय संदीप कुमार मीणा की कहानी मुश्किल हालात को मौके में बदलने की मिसाल है। पांच बकरियों से शुरू हुआ उनका सफर आज “गोटवेदा” नाम के स्टार्टअप तक पहुंच चुका है, जिसका टर्नओवर 18 लाख रुपए से ज्यादा बताया जा रहा है।
पढ़ाई से नौकरी तक
संदीप एग्रीकल्चर में बीएससी करना चाहते थे, लेकिन इसमें चार साल लगते और उसके बाद प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी भी करनी पड़ती। घर के हालात देखते हुए उन्होंने वेटेनरी में दो साल का डिप्लोमा चुना, ताकि पशुधन सहायक की नौकरी आसानी से मिल सके। 2020 में पढ़ाई पूरी हुई और दिसंबर 2020 में उन्होंने प्राइवेट कंपनी जॉइन कर ली। कोरोना के कारण शुरुआत में वर्क फ्रॉम होम रहा।
पिता के निधन के बाद बढ़ीं जिम्मेदारियां
पिता जीवन राम मीणा पत्थर का काम करते थे और सिलिकोसिस से पीड़ित थे। कोरोनाकाल में 2021 में उनका निधन हो गया। परिवार की जिम्मेदारी बढ़ी तो कंपनी के गुरुग्राम ऑफिस में जॉइन करना संभव नहीं था। करीब तीन साल तक उन्होंने जॉइनिंग टाली। इसी दौरान 2022 से वर्क फ्रॉम होम के साथ उन्होंने अपने स्टार्टअप पर काम शुरू किया।
बकरी के दूध से आया आइडिया
कोरोना के समय बकरी के दूध की मांग देखकर संदीप को स्टार्टअप का विचार आया। तब उनके पास करीब 5 बकरियां थीं। जयपुर में चित्रकूट स्टेडियम के पास लगने वाले ऑर्गेनिक मार्केट में उन्होंने 250 रुपए लीटर के भाव से दूध बेचना शुरू किया। यहीं पहले ग्राहक मिले और बाजार की समझ बनी। दूध महंगा होने से मांग कम रही।
दूध से पाउडर, घी और साबुन
ऑनलाइन मार्केट को समझकर संदीप ने दूध को पाउडर, घी और साबुन जैसे उत्पादों में बदलकर बेचना शुरू किया। प्रोसेसिंग यूनिट के लिए पैसे नहीं थे, इसलिए बल्क में दूध इकट्ठा कर पाउडर बनाना शुरू किया। “गोटवेदा” नाम से रजिस्ट्रेशन कराया और जब स्टार्टअप जम गया तो 2025 में नौकरी छोड़ दी। आज 25 किसान उनसे जुड़े हैं, जिनसे वे बाजार भाव से ज्यादा दाम पर दूध खरीदते हैं। पहले मांग न होने से किसान नियमित दूध नहीं बेच पाते थे, अब नियमित खरीद से स्थानीय लोगों को भी फायदा हो रहा है। मां कमला भी काम में हाथ बंटाती हैं, जबकि छोटा भाई बृजेश ग्रेजुएशन कर रहा है।
खेती और बकरी पालन का मेल
संदीप के पास साढ़े तीन बीघा जमीन है। खेत में तारबंदी कर बकरियों को खुला छोड़ा जाता है। उनके पास जयपुर की रजिस्टर्ड ब्रीड गुर्जर और सिरोही नस्ल की 20 बकरियां हैं, जिनमें से हर एक से रोजाना करीब एक से डेढ़ लीटर दूध मिलता है। उनके मुताबिक फार्म में बांधकर पालने में खर्च ज्यादा आता है, जबकि ग्रेजिंग में कम। चारे और अतिरिक्त आमदनी के लिए उन्होंने 2025 में अरडू के 100 पौधे लगाए, जिनमें 60 जीवित हैं और करीब 10 फीट ऊंचे हो चुके हैं। बकरियां इसकी पत्तियां चाव से खाती हैं, जिससे दूध बढ़ता है। संदीप का दावा है कि पेड़ करीब 10 साल में तैयार होते हैं और एक पौधे से लगभग 15 क्विंटल लकड़ी मिल सकती है, जो बाजार में 1,000 रुपए क्विंटल तक बिकती है। पानी की कमी के कारण वे बारिश की फसल लेते हैं। इस बार तीन बीघा में 5 क्विंटल बाजरा हुआ, जिसे सर्दियों में बकरियों को खिलाते हैं। गर्मियों में जौ दिया जाता है, क्योंकि इसकी तासीर ठंडी होती है। संदीप की कहानी बताती है कि सीमित संसाधनों में भी सही समझ और लगन से रास्ता निकल सकता है।