जल जीवन मिशन की सुस्त रफ्तार: 44 लाख घरों को नल का इंतजार, 90% पेयजल परियोजनाओं पर काम ठप
संवेदकों के 3200 करोड़ रुपये दो साल से अटके, राजस्थान में कवरेज सिर्फ 59.24 प्रतिशत
फ्राइडे संवाद. जयपुर | हर ग्रामीण परिवार तक नल से शुद्ध पेयजल पहुंचाने के उद्देश्य से 2019 में शुरू हुआ जल जीवन मिशन (जेजेएम) राजस्थान में सुस्त रफ्तार से जूझ रहा है। प्रदेश के 1 करोड़ 7 लाख 87 हजार 724 ग्रामीण परिवारों में से अब तक 63 लाख 90 हजार 739 घरों (59.24%) तक ही नल कनेक्शन पहुंच सके हैं। 44 लाख परिवार अब इंतजार में हैं। मिशन की समय सीमा 2028 तक बढ़ाए जाने के बावजूद काम अपेक्षित गति नहीं पकड़ सका है।
भुगतान अटका, काम ठप
संवेदकों का करीब 3200 करोड़ रुपये का भुगतान दो साल से लंबित है, जिससे प्रदेश में 90% पेयजल परियोजनाओं का काम ठप बताया जा रहा है। संवेदक दो बार हड़ताल भी कर चुके हैं। अधिकारियों ने बैठकों में रोजाना 10 हजार कनेक्शन जारी करने की बात कही, लेकिन जमीनी स्थिति उलट है। मंगलवार को 41 जिलों में एक भी जल कनेक्शन जारी नहीं हुआ। बजट संकट के कारण पिछले दो वर्षों में परियोजनाएं प्रभावित हुईं। हाल के महीनों में बजट जारी होना शुरू हुआ है, लेकिन इससे गति कितनी मिलेगी, यह बड़ा सवाल है।
50% से नीचे के 13 जिले
सबसे ज्यादा पिछड़ापन उदयपुर संभाग में है। बाड़मेर में 2,73,250 परिवारों में से केवल 58,450 को कनेक्शन मिले हैं, यानी प्रगति 21.39% है। डीग (28.73%), चित्तौड़गढ़ (28.96%) और डूंगरपुर (33.87%) भी पीछे हैं। उदयपुर जिले के 4.40 लाख परिवारों में से सिर्फ 1.64 लाख घरों में नल हैं। वहां दुर्गम पहाड़ियों तक पाइपलाइन बिछाना कठिन साबित हो रहा है। आदिवासी अंचल में दोहरी चुनौती है।
पानी की उपलब्धता भी चुनौती
कमजोर मानसूनी बारिश और कई जिलों में भूजल स्तर गिरने से चुनौती और बढ़ गई है। सवाल केवल पाइपलाइन पहुंचाने का नहीं, बल्कि नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करने का भी है। देशभर में जेजेएम का राष्ट्रीय औसत 82.52% है, जबकि राजस्थान सबसे पिछड़े राज्यों की कतार में है। प्रदेश में हनुमानगढ़ (90.97%), भीलवाड़ा (89.75%) और श्रीगंगानगर (88.77%) बेहतर काम वाले जिले हैं।