क़यामत का मंज़र और हमारी बेबसी
क़यामत का दिन इंसान के लिए ऐसा दिन होगा, जिसकी गंभीरता और भयावहता का अंदाज़ा लगाना भी मुश्किल है। दुनिया की सारी चमक-दमक, दौलत, शोहरत, ताकत और ऐशो-आराम समाप्त हो जाएंगे। जिन चीज़ों को इंसान पूरी ज़िंदगी अपनी सबसे बड़ी कामयाबी समझता रहा, उस दिन उनकी कोई अहमियत नहीं रह जाएगी। उस दिन इंसान अपने सबसे करीबी रिश्तों से भी बेपरवाह होगा। भाई, बहन, माता-पिता, पत्नी और औलाद जैसे रिश्ते दुनिया में कितने ही प्यारे क्यों न हों, लेकिन उस कठिन घड़ी में हर व्यक्ति को अपने ही अंजाम की चिंता होगी। हर इंसान अपने कर्मों और अपने हिसाब-किताब को लेकर परेशान होगा।
आज हम दुनिया की छोटी-छोटी परेशानियों से घबरा जाते हैं। धन कम होने, कारोबार में नुकसान, नौकरी की चिंता, लोगों की नाराज़गी और सामाजिक प्रतिष्ठा जैसी चीज़ों को लेकर दिन-रात परेशान रहते हैं। लेकिन एक ऐसा दिन भी आने वाला है, जब दुनिया की ये सभी चिंताएं बहुत छोटी महसूस होंगी और इंसान को केवल अपने किए हुए कर्मों की चिंता होगी।
उस दिन न धन काम आएगा, न पद, न प्रतिष्ठा और न दुनिया की कोई ताकत। इंसान के पास अपने कर्मों के अलावा कुछ नहीं होगा। इसलिए ज़रूरी है कि हम आज ही अपनी ज़िंदगी पर विचार करें और देखें कि हम किस रास्ते पर चल रहे हैं। अगर हमसे कोई गलती हुई है तो उसे स्वीकार करें, दूसरों के अधिकार न छीनें, किसी का दिल न दुखाएं, ज़ुल्म से बचें और अपने व्यवहार को बेहतर बनाएं। खुदा ने हमें सुधार और तौबा का मौका दिया है, इसलिए इसे बेकार नहीं जाने देना चाहिए।
क़यामत आने से पहले हमारे पास अपने जीवन को सुधारने का अवसर है। आज का समय हमारे हाथ में है, लेकिन कल का भरोसा नहीं।
रब हमें क़यामत की हौलनाकियों से बचाए, सही रास्ते पर चलने की तौफ़ीक़ दे और अपनी रहमत में जगह अता फरमाए। आमीन।