नियोम: रेगिस्तान का सबसे बड़ा ख्वाब, जो अब सन्नाटे में बदल गया
वॉल स्ट्रीट जर्नल के ऑडिट खुलासे में लागत 8.8 ट्रिलियन डॉलर तक, 2080 तक खिंच सकती है सऊदी अरब की मेगा परियोजना
सऊदी अरब के रेगिस्तान में कभी एक ऐसा सपना देखा गया था, जो पूरा होता तो दुनिया का सबसे अनोखा शहर कहलाता। हवा में लटकती इमारतें, तपते सहरा में बर्फ के पहाड़ और आसमान में चमकता कृत्रिम चांद, क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (एमबीएस) की महत्वाकांक्षी परियोजना ‘नियोम’ का खाका कुछ ऐसा ही था। लेकिन वॉल स्ट्रीट जर्नल की खोजी रिपोर्टों और सैटेलाइट तस्वीरों के मुताबिक जहां दुनिया का सबसे आधुनिक शहर बसना था, वहां आज जमीन में गहरे गड्ढे, अधूरा निर्माण और गहरी खामोशी है।
तेल से आगे की सोच
एमबीएस का मकसद सिर्फ एक शहर बनाना नहीं था। वे दुनिया को दिखाना चाहते थे कि सऊदी अरब अब सिर्फ तेल बेचने वाला मुल्क नहीं रहा। इस सपने का केंद्र था ‘द लाइन’, जिसे 170 किलोमीटर लंबी और 500 मीटर ऊंची दो समानांतर इमारतों के रूप में प्रस्तावित किया गया था। इसका पैमाना समझना हो तो यह दूरी लगभग दिल्ली से मथुरा के बराबर है। योजना थी कि इसी एक संरचना में करीब 90 लाख लोग रहेंगे। कई बड़ी इंजीनियरिंग फर्मों ने शुरुआत में ही इसे अव्यावहारिक बताया था।
चार बड़े प्रोजेक्ट
कृत्रिम चांद, रोबोटिक डायनासोर वाले थीम पार्क और रेगिस्तान में कृत्रिम बर्फबारी जैसी योजनाओं की चर्चा भी रही। नियोम के चार बड़े प्रोजेक्ट थे। पहला, ‘द लाइन’ नाम की लीनियर सिटी। दूसरा, ‘ट्रोजेना’ नाम का पहाड़ी स्की रिसॉर्ट, जहां साल के कुछ महीने बर्फबारी और स्कीइंग कराने की योजना थी। तीसरा, ‘ऑक्सागोन’ नाम का तैरता औद्योगिक बंदरगाह शहर। और चौथा, लाल सागर में लग्जरी आइलैंड रिसॉर्ट ‘सिंदलाह’।
सैटेलाइट तस्वीरों में अधूरा सच
सैटेलाइट तस्वीरों के हवाले से किए जा रहे दावों के मुताबिक ‘द लाइन’ के लिए बड़े पैमाने पर खुदाई और पिलर का काम हुआ, लेकिन अब ट्रोजेना और सिंदलाह जैसे ठिकानों पर काम थमा दिखता है। सिंदलाह में जहां फोर सीजन्स होटल बनना था, वहां अधूरा निर्माण बताया गया है। 2024 में WSJ और ब्लूमबर्ग ने रिपोर्ट किया था कि ‘द लाइन’ का पहला चरण सिर्फ 2.4 किलोमीटर लंबा होगा, जबकि सऊदी अधिकारियों ने इससे इनकार करते हुए कहा था कि परियोजना योजना के मुताबिक चल रही है। अब तक 50 अरब डॉलर से ज्यादा खर्च की बात भी रिपोर्टों में कही गई है।
डर, खुशामद और आंकड़ों की हेराफेरी
विशेषज्ञों के मुताबिक नियोम की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी एकतरफा सत्ता-संरचना थी। एमबीएस ही परियोजना के चेयरमैन थे और वही सार्वजनिक निवेश कोष (पीआईएफ) को भी नियंत्रित करते थे, जिससे फंडिंग आती थी। ऑडिट के अनुसार प्रबंधन के कुछ सदस्यों ने लागत बढ़ने को सही ठहराने के लिए कमाई के अनुमान बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए, ताकि प्रोजेक्ट मुनाफे वाला दिखे। रिपोर्ट के मुताबिक जिस प्रोजेक्ट मैनेजर ने अवास्तविक अनुमानों पर सवाल उठाया, उसे हटा दिया गया। लागत घटाने के सुझाव, जैसे ‘द लाइन’ की ऊंचाई कम करना, भी क्राउन प्रिंस ने ठुकरा दिए।
ऑडिट ने खोली पोल
पर्दा तब उठा जब मार्च 2025 में WSJ ने नियोम के एक आंतरिक ऑडिट की खबर छापी। 2024 की बसंत में बोर्ड के सामने रखे गए इस ऑडिट में, जिसमें McKinsey की मदद ली गई थी, नियोम की पूरी लागत 8.8 ट्रिलियन डॉलर आंकी गई, जबकि घोषित बजट करीब 500 अरब डॉलर था। यह रकम सऊदी के सालाना सरकारी बजट से 25 गुना से ज्यादा है। ऑडिट के मुताबिक जिस परियोजना को 2030 तक आकार लेना था, वह अपने मूल रूप में 2080 तक ही पूरी हो पाएगी। यानी आंकड़े जितने बड़े थे, कागजी हेराफेरी की गुंजाइश उतनी ही बड़ी।
‘बंद’ नहीं, ‘प्राथमिकता तय’
आधिकारिक रुख यह बताया गया है कि नियोम बंद नहीं हुआ, बल्कि उसकी प्राथमिकताएं दोबारा तय की गई हैं। इसी बीच सालों से रुका जेद्दा टावर प्रोजेक्ट 2025 में फिर शुरू किया गया। जानकारों का अनुमान है कि सऊदी अब पहले अधूरे और व्यावहारिक प्रोजेक्ट पूरे करके निवेशकों का भरोसा लौटाना चाहता है। ऑडिट के निष्कर्षों पर नियोम प्रबंधन असहमत है और सऊदी पक्ष की ओर से इन दावों की पूरी पुष्टि नहीं हुई है।
नियोम की कहानी सिर्फ एक शहर की नाकामी नहीं, बल्कि दुनिया के लिए सबक है। जब बेहिसाब पैसा, अव्यावहारिक सपने और डर एक साथ मिल जाते हैं, तो अरबों डॉलर की इमारतें भी रेगिस्तान की रेत में दब जाती हैं।