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रोज़ा गुनाहों से ढाल; केवल भूखे-प्यासे रहने से कोई मतलब नहीं

By Friday Sanwad
February 20, 2026 2 Min Read
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हमारे रब का फरमान है, “ऐ लोगो! जो ईमान लाए हो, तुम पर रमज़ान का रोज़ा फ़र्ज़ किया गया, जिस तरह तुमसे पहले लोगों पर फ़र्ज़ किया गया था, ताकि तुम्हारे अंदर तकवा पैदा हो।” रोज़ा के लिए कुरान में “सियाम” शब्द आया है, जिसका अर्थ है किसी चीज़ से रुक जाना। शरीअत की भाषा में सुबह सादिक़ से सूरज डूबने तक खाने-पीने और दाम्पत्य संबंधों से रुक जाने का नाम रोज़ा है। रमज़ान के रोज़े 2 हिजरी में फ़र्ज़ हुए। इससे पहले रसूल (स.अ.व.) और सहाबा आशूरा यानी 10 मुहर्रम का रोज़ा रखा करते थे। जब रमज़ान के रोज़े फ़र्ज़ हुए तो आशूरा के रोज़े में छूट दे दी गई कि जो चाहे रखे और जो चाहे न रखे।

रोज़े के बारे में खास फरमान

सहीह हदीस के मुताबिक रोज़ा गुनाहों से ढाल है। यह केवल भूखे-प्यासे रहने या इच्छाओं से रुक जाने का नाम नहीं, बल्कि झूठ, गाली-गलौज और बुरे कामों को छोड़ देना भी रोज़े का अहम हिस्सा है। हदीस में आया है, “जो झूठ बोलना और बुरे कामों को नहीं छोड़ता, रब को उसके भूखे-प्यासे रहने की कोई ज़रूरत नहीं।” इंसान के हर नेक अमल का सवाब सात गुने से लेकर सात सौ गुने तक मिलता है, लेकिन रोज़े के बारे में खास फरमान है: “अस्सौमु ली — रोज़ा मेरे लिए है और मैं ही इसका बदला दूंगा।”

बीमार हो या सफर में हो, वह दूसरे दिनों में कज़ा कर ले

कुरान में आया है कि ये रोज़े गिनती के कुछ दिनों में हैं। जो बीमार हो या सफर में हो, वह दूसरे दिनों में कज़ा कर ले। जो लोग ताकत रखते हुए भी रोज़ा न रखें, वे हर रोज़े के बदले एक मिस्कीन को खाना खिलाएं। मिस्कीन वह है जो अपनी जरूरत के बावजूद शर्म और खुद्दारी के कारण हाथ नहीं फैलाता। जो बुढ़ापे या गंभीर बीमारी की वजह से रोज़ा रखने की ताकत नहीं रखते, उनके जिम्मे भी हर रोज़े के बदले एक मिस्कीन को खाना खिलाना है। इसे बोझ नहीं, बल्कि रब की रज़ा के लिए खुशी-खुशी अदा करना चाहिए।

लेखक: अबु अदीम फ़लाही (इस्लामिक थियोलॉजी)

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