नई दिल्ली। देश में जेनरेशन ज़ेड (1997-2012 के बीच जन्मी पीढ़ी) तेजी से कर्ज के जाल में फंसती जा रही है। सिबिल की रिपोर्ट के अनुसार नए ऋण लेने वालों में 41 प्रतिशत हिस्सेदारी जेनरेशन ज़ेड की है, जबकि सी-रिफ हाई मार्क और यूनिफाइड फिनटेक फोरम की रिपोर्ट बताती है कि 26 से 35 वर्ष के 65 प्रतिशत से अधिक युवा गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों और फिनटेक मंचों से ऋण ले रहे हैं। चिंताजनक यह है कि कई युवा 30-40 हजार रुपये की मासिक आय पर 30-40 लाख रुपये तक का कर्ज उठा रहे हैं। यह प्रवृत्ति बेंगलुरु, दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में सबसे अधिक देखी जा रही है। डिजिटल ऋण, क्रेडिट कार्ड, “अभी खरीदें-बाद में चुकाएं” योजनाओं और मोबाइल ऐप लोन ने उधार लेना अत्यंत आसान बना दिया है।
विशेषज्ञों के अनुसार, सोशल मीडिया का दिखावे का दबाव, महंगाई और जीवनशैली पर बढ़ता खर्च इस समस्या को और गहरा कर रहा है। युवा मोबाइल, गैजेट और यात्रा के लिए छोटे असुरक्षित ऋण लेते हैं, जो बाद में बड़े बोझ में बदल जाते हैं। पुराना कर्ज चुकाने के लिए नया कर्ज लेना स्थिति को और बिगाड़ देता है। रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया की वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट भी सूक्ष्म-वित्त और असुरक्षित ऋणों में बढ़ती चूक की पुष्टि करती है।
विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि युवा आय के मुकाबले कर्ज का अनुपात 30 प्रतिशत से कम रखें, आपातकालीन निधि बनाएं और केवल संपत्ति निर्माण से जुड़े ऋण ही लें।
