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टीपू सुल्तान जिन्होंने गुलामी की जिंदगी को कभी कुबूल नहीं किया

By Friday Sanwad
January 23, 2026 2 Min Read
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हिंदुस्तान की आजादी की जंग में अगर किसी बहादुर ने अंग्रेजों को दिन में तारे दिखाए, तो वह मैसूर के शेर टीपू सुल्तान थे। 4 मई 1799 को श्रीरंगपट्टनम की जंग में शहीद हुए इस महान योद्धा की कुर्बानी आज भी याद की जाती है। उनकी शहादत के बाद एक अंग्रेज अफसर ने उनकी लाश पर खड़े होकर कहा था, “अब मैं हिंदुस्तान पर खड़ा हूं।”

अंग्रेजों के लिए सबसे बड़ा खतरा

टीपू सुल्तान ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए सबसे बड़ी रुकावट थे। जब पूरे हिंदुस्तान में अंग्रेज अपना कब्जा जमा रहे थे, तब मैसूर की सल्तनत उनके लिए एक मजबूत दीवार साबित हो रही थी। टीपू की बहादुरी और जंगी हुनर की चर्चा सिर्फ बर्रे सगीर (भारतीय उपमहाद्वीप) में ही नहीं, बल्कि यूरोपीय मुल्कों में भी थी। उन्होंने अंग्रेजों से कई जंगें लड़ीं और हर बार दुश्मन को नाकों चने चबवाए। उनकी फौज में रॉकेट तकनीक का इस्तेमाल दुनिया भर में मशहूर हुआ। फ्रांस तक से उन्होंने ताल्लुकात कायम किए ताकि अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा मजबूत हो सके।

गद्दारी ने दिलाई शिकस्त

मगर अफसोस, अपनों की गद्दारी और धोखेबाजी ने टीपू को कमजोर कर दिया। चौथी आंग्ल-मैसूर जंग में जब अंग्रेज, निजाम और मराठा सब मिलकर मैसूर पर टूट पड़े, तो कुछ सरदारों ने वक्त पर साथ नहीं दिया। श्रीरंगपट्टनम के किले की दीवारों पर लड़ते हुए टीपू शहीद हो गए, लेकिन घुटने नहीं टेके।

शेर की एक दिन की ज़िंदगी

शहीद होने से पहले टीपू सुल्तान ने जो बात कही, वह तारीख के सफहात पर हमेशा के लिए अमर हो गई: “गीदड़ की सौ साला जिंदगी से शेर की एक दिन की जिंदगी बेहतर है।” यह जुमला उनकी शख्सियत का आईना है। उन्होंने गुलामी की जिंदगी को कभी कुबूल नहीं किया और आजादी के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी।

विरासत जो आज भी जिंदा है

आज 225 साल बाद भी टीपू सुल्तान की बहादुरी और वतनपरस्ती का जिक्र होता है। उन्होंने साबित कर दिया कि हिम्मत और जज्बे के सामने कोई ताकत टिक नहीं सकती। उनकी शहादत हिंदुस्तान की आजादी की तहरीक में एक अहम पड़ाव थी, जिसने आने वाली नस्लों को आजादी की लड़ाई लड़ने का हौसला दिया। टीपू सुल्तान सिर्फ एक बादशाह नहीं थे, बल्कि एक मिसाल थे—जो यह सिखाती है कि वतन के लिए मरना कैसे होता है।

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