विशेष रिपोर्ट
जब मक्का की पवित्र मस्जिद (हरम शरीफ) के स्पीकरों से कुरान की आयतें गूँजती हैं, तो दुनिया भर के करोड़ों मुसलमानों के दिलों में एक खास सुकून उतरता है। वह आवाज है शेख डॉ. अब्दुल रहमान अल-सुदैस की। पिछले चार दशकों से काबा के मुख्य इमाम के रूप में पहचान बनाने वाले शेख सुदैस का जीवन न केवल धार्मिक निष्ठा, बल्कि उच्च शिक्षा और मानवता का एक बेजोड़ उदाहरण है।
बचपन और शिक्षा: एक मेधावी सफर
1960 में सऊदी अरब के कासिम प्रांत में जन्मे अब्दुल रहमान अल-सुदैस बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि महज 12 साल की उम्र में कुरान को पूरी तरह कंठस्थ (हिफ्ज़) करना था। उनके माता-पिता ने उनकी शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया, जिसका परिणाम यह हुआ कि उन्होंने रियाद के ‘मोहम्मद बिन सऊद इस्लामिक यूनिवर्सिटी’ से ग्रेजुएशन किया और बाद में ‘उम्म अल-कुरा यूनिवर्सिटी’ से डॉक्टरेट (PhD) की उपाधि प्राप्त की।
22 साल की उम्र में काबा के इमाम
शेख सुदैस के जीवन का सबसे ऐतिहासिक मोड़ 1984 में आया। मात्र 22 वर्ष की आयु में उन्हें दुनिया की सबसे पवित्र मस्जिद, मस्जिद-अल-हराम का इमाम नियुक्त किया गया। इतनी कम उम्र में इस गरिमामय पद पर पहुँचना उनकी काबिलियत का प्रमाण था। उनकी विशिष्ट लयबद्ध आवाज (Tajweed) ने उन्हें रातों-रात अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिला दी।
विचारधारा और अब्दुल वहाब का प्रभाव
धार्मिक रूप से शेख सुदैस को मुहम्मद इब्न अब्दुल वहाब की शिक्षाओं का अनुयायी माना जाता है। वह ‘तौहीद’ (एकेश्वरवाद) और इस्लाम के शुद्धिकरण के उन्हीं सिद्धांतों का प्रचार करते हैं, जिसकी नींव अब्दुल वहाब ने 18वीं शताब्दी में रखी थी। हालांकि, सुदैस ने हमेशा आतंकवाद और हिंसा का विरोध किया है। उन्होंने अपने कई खुतबों में स्पष्ट रूप से कहा है कि इस्लाम शांति का धर्म है और इसमें निर्दोषों की हत्या का कोई स्थान नहीं है।
मानवता और वैश्विक शांति के दूत
2005 में दुबई इंटरनेशनल होली कुरान अवार्ड द्वारा उन्हें ‘इस्लामिक पर्सनैलिटी ऑफ द ईयर’ चुना गया। वह केवल एक इमाम नहीं, बल्कि एक प्रशासक भी हैं। वर्तमान में वह ‘दो पवित्र मस्जिदों के मामलों के सामान्य प्रेसीडेंसी’ के प्रमुख हैं। उनके नेतृत्व में हज और उमराह की व्यवस्थाओं में तकनीकी क्रांति आई है, जिससे लाखों जायरीनों को सुविधा मिली है।
आधुनिकता और परंपरा का मेल
शेख सुदैस ने आधुनिक दुनिया की चुनौतियों पर भी खुलकर बात की है। वह अंतर-धार्मिक संवाद (Interfaith Dialogue) के समर्थक रहे हैं और दुनिया भर में इस्लाम के प्रति फैली गलतफहमियों को दूर करने के लिए लगातार यात्राएं और सम्मेलन करते रहते हैं।
