श्रीमाधोपुर में बस से 18 पाटागोह, शतावरी और शिकार में प्रयुक्त सामग्री बरामद, चार आरोपी गिरफ्तार
वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत मामला दर्ज
फ्राइडे संवाद. सीकर | उप वन संरक्षक सीकर प्रदीप कुमार के निर्देशन में वन विभाग की टीम ने श्रीमाधोपुर में अजीतगढ़ रोड पर नाकाबंदी के दौरान एक बस की तलाशी लेकर 18 जीवित पाटागोह, वन उपज औषधि शतावरी तथा शिकार में प्रयुक्त सामग्री बरामद की है। मामले में चार व्यक्तियों को पकड़ा गया है। इनमें से तीन आरोपियों को न्यायालय में पेश कर 16 अक्टूबर 2026 तक पुलिस, वन विभाग रिमांड पर लिया गया, जबकि एक बाल अपचारी को किशोर न्याय बोर्ड सीकर के समक्ष पेश किया गया। सहायक वन संरक्षक वन्यजीव सीकर देवेंद्र सिंह राठौड़ से प्राप्त सूचना के आधार पर सहायक वन संरक्षक मुख्यालय सीकर कीर्ति राठौड़ के पर्यवेक्षण एवं सहयोग तथा क्षेत्रीय वन अधिकारी जितेंद्र सिंह चौधरी के नेतृत्व में टीम गठित की गई। टीम ने रेंज कार्यालय श्रीमाधोपुर के मुख्य द्वार के पास जालपाली से अजीतगढ़ रोड पर नाकाबंदी की।
दो प्लास्टिक के कट्टों में 18 जीवित पाटागोह
इस दौरान बस संख्या RJ09PA2776 को रुकवाकर तलाशी ली गई। बस की डिक्की में रखे सामान से दो प्लास्टिक के कट्टों में 18 जीवित पाटागोह, एक प्लास्टिक के कट्टे में औषधीय वन उपज शतावरी तथा दो लोहे के कुरसे बरामद किए गए। मामले में नेमाराम पुत्र सायरमल बावरिया निवासी चितावा, जिला नागौर, लादूराम बावरिया पुत्र सांवरराम निवासी खोरण्डी, जिला नागौर, रामचंद्र बावरिया पुत्र नंदाराम निवासी नगवाड़ा, जिला नागौर तथा कोमरेड पुत्र बनवारी बावरिया निवासी नगवाड़ा, जिला नागौर को पकड़ा गया। वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 एवं राजस्थान वन अधिनियम, 1953 के तहत प्रकरण दर्ज कर जांच शुरू की गई।
जांच में शिकार और बिक्री के उद्देश्य का खुलासा
अनुसंधान के दौरान रामचंद्र बावरिया की निशानदेही पर चीपलाटा स्थित सोहन बावरिया के घर से एक टोपीदार बंदूक तथा शिकार किए गए झाऊ चूहे के कांटे बरामद किए गए। जांच में आरोपियों ने पाटागोह का शिकार मांस खाने एवं बेचने तथा उनके अंगों की बिक्री करने के उद्देश्य से किए जाने की बात बताई। लोहे के कुरसों का उपयोग पाटागोह के बिल खोदने में किया जाता था। वहीं, शतावरी को औषधि के लिए 200 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बेचने की जानकारी सामने आई।
वन्यजीव संरक्षण एवं वन अधिनियम के तहत कार्रवाई
वन विभाग ने वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की धारा 9, 39, 48(ख), 52, 57/51 तथा राजस्थान वन अधिनियम, 1953 की धारा 41, 42 एवं 52(2) के तहत कार्रवाई की है। विभाग के अनुसार, संबंधित प्रावधानों के उल्लंघन पर कम से कम तीन वर्ष से लेकर सात वर्ष तक के कारावास एवं 25 हजार रुपये जुर्माने का प्रावधान है।