नई दिल्ली | भारत में हीरे (डायमंड) की खरीद-बिक्री को लेकर उपभोक्ताओं को लंबे समय से भ्रम की स्थिति का सामना करना पड़ रहा था। अलग-अलग शब्दों और भ्रामक नामों के इस्तेमाल से यह स्पष्ट नहीं हो पाता था कि जो हीरा खरीदा जा रहा है वह प्राकृतिक है या लैब में बनाया गया। अब इस समस्या के समाधान के लिए भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) ने नया मानक आईएस 19469:2025 लागू कर दिया है, जिसे प्राकृतिक हीरा परिषद (एनडीसी) ने उपभोक्ता हित में एक बड़ा कदम बताया है। नए मानक के तहत “डायमंड” शब्द का इस्तेमाल अब केवल प्राकृतिक हीरों के लिए ही किया जा सकेगा। विक्रेता चाहें तो इसके साथ “नेचुरल”, “रियल”, “जेनुइन” या “प्रेशियस” जैसे शब्द जोड़ सकते हैं, लेकिन अकेले “डायमंड” कहना सिर्फ प्राकृतिक हीरे के लिए ही वैध होगा। लैब में बनाए गए हीरों के लिए सख्त नियम तय किए गए हैं। अब इन्हें केवल “लैबोरेट्री-ग्रोन डायमंड” या “लैबोरेट्री-क्रिएटेड डायमंड” कहकर ही बेचा जा सकेगा। “एलजीडी”, “लैब-ग्रोन” या “लैब-डायमंड” जैसे छोटे या अधूरे शब्दों का इस्तेमाल औपचारिक खुलासे में प्रतिबंधित कर दिया गया है। इसके अलावा “नेचर-फ्रेंडली”, “प्योर”, “कल्चर्ड” या “नेचर का बना” जैसे भ्रामक शब्दों के उपयोग पर भी रोक लगा दी गई है।
प्राकृतिक हीरा परिषद की मैनेजिंग डायरेक्टर ऋचा सिंह ने कहा कि यह मानक उपभोक्ताओं के लिए लंबे समय से जरूरी स्पष्टता लेकर आया है। जब कोई व्यक्ति हीरा खरीदता है, तो उसे यह पूरी तरह पता होना चाहिए कि वह प्राकृतिक है या लैब में बनाया गया। इससे उपभोक्ता का भरोसा मजबूत होगा और प्राकृतिक हीरों के मूल्य की भी रक्षा होगी।ज्वेलरी कारोबार से जुड़े कई बड़े नामों ने भी इस फैसले का स्वागत किया है। नव रत्न ज्वैलर्स के तरुण कंवर, ऐशप्रा ज्वेलरी के वैभव सराफ और आनंद ज्वेल्स के गौरव आनंद सहित कई व्यापारियों ने इसे पारदर्शिता और भरोसे की दिशा में अहम कदम बताया है। एनडीसी ने भरोसा दिलाया है कि वह बीआईएस और भारतीय अधिकारियों के साथ मिलकर इस मानक को प्रभावी ढंग से लागू कराने में सहयोग करेगा, ताकि हर हीरे की खरीद भावनात्मक और आर्थिक दोनों रूप से सुरक्षित बन सके।
