फ्राइडे संवाद. जोधपुर | राजस्थान हाई कोर्ट की फटकार के 24 घंटे के भीतर राजस्थान पुलिस मुख्यालय ने ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए आरोपियों की फोटो या वीडियो सोशल मीडिया पर साझा करने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है। अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (अपराध) डॉ. हवा सिंह घुमरिया ने 21 जनवरी को प्रदेश के सभी पुलिस कमिश्नर, आईजी और एसपी को सख्त मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) जारी की है। आदेश में स्पष्ट किया गया है कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रत्येक व्यक्ति को गरिमा और निजता का मौलिक अधिकार प्राप्त है, इसलिए अब गिरफ्तारी के दौरान या बाद में किसी भी अभियुक्त का फोटो-वीडियो सोशल मीडिया, मीडिया या प्रेस में साझा नहीं किया जाएगा।
जमीन पर न बिठाने के निर्देश
नए आदेश के तहत मीडिया ट्रायल पर भी रोक लगाई गई है। आरोपियों को मीडिया के सामने अपमानजनक स्थिति में प्रस्तुत नहीं किया जाएगा। थानों में आरोपियों को बैठाने की सभ्य व्यवस्था सुनिश्चित करने और उन्हें जमीन पर न बिठाने के निर्देश दिए गए हैं। महिलाओं, वृद्धों और कमजोर वर्गों के साथ विशेष संवेदनशीलता बरतने को कहा गया है। यह कदम 20 जनवरी को जस्टिस फरजंद अली की उस टिप्पणी के बाद उठाया गया जिसमें उन्होंने पुलिस द्वारा आरोपियों को अर्धनग्न करने और फोटो वायरल करने को “संवैधानिक नैतिकता पर प्रहार” बताया था।
पुलिस के ‘गुड वर्क’ के दिखावे पर संविधान की जीत
राजस्थान हाई कोर्ट के अधिवक्ता कल्बे मोहम्मद ने इसे “पुलिस के ‘गुड वर्क’ के दिखावे पर संविधान की जीत” करार दिया। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर एक बार फोटो वायरल होने के बाद, व्यक्ति बरी हो जाने पर भी डिजिटल दुनिया में हमेशा ‘अपराधी’ बना रहता है। पुलिस मुख्यालय ने चेतावनी दी है कि इन दिशा-निर्देशों की अवहेलना करने वाले अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्यवाई की जाएगी।
