भाषा शिक्षा का उद्देश्य बोझ नहीं, अवसर होना चाहिए
फ्राइडे संवाद. आबिद अली | देश में नई शिक्षा नीति और तीन-भाषा नीति को लेकर बहस लगातार जारी है। तमिलनाडु सरकार और केंद्र के बीच चल रहे विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना की टिप्पणी ने एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा किया ह—क्या नौवीं कक्षा में तीसरी भाषा शुरू करना छात्रों पर अनावश्यक बोझ बढ़ाता है? न्यायमूर्ति ने सुझाव दिया कि यदि तीसरी भाषा पढ़ानी ही है, तो उसकी शुरुआत छठी कक्षा से होनी चाहिए। यह विचार व्यावहारिक भी है। नौवीं और दसवीं कक्षा विद्यार्थियों के लिए बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी का सबसे महत्वपूर्ण समय होता है। ऐसे में नई भाषा जोड़ने से पढ़ाई का दबाव बढ़ सकता है और छात्र मूल विषयों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दे पाएंगे। हालांकि, यह भी ध्यान रखना होगा कि तीन-भाषा नीति का उद्देश्य किसी विशेष भाषा को थोपना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों को बहुभाषी बनाना और उनकी भाषाई क्षमता का विकास करना है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति भी स्पष्ट करती है कि किसी राज्य पर कोई भाषा अनिवार्य रूप से नहीं थोपी जाएगी। राज्यों को अपनी परिस्थितियों और विद्यार्थियों की आवश्यकताओं के अनुरूप भाषा का चयन करने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।आज के वैश्विक दौर में एक से अधिक भाषाओं का ज्ञान छात्रों के लिए अवसरों के नए द्वार खोलता है। लेकिन शिक्षा व्यवस्था का मूल सिद्धांत यह होना चाहिए कि सीखने की प्रक्रिया सरल, क्रमबद्ध और तनावमुक्त हो। यदि तीसरी भाषा को प्रारंभिक कक्षाओं से धीरे-धीरे पढ़ाया जाए, तो छात्र उसे सहजता से सीख सकते हैं। इस विषय पर राजनीति से अधिक विद्यार्थियों के हित को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। केंद्र और राज्य सरकारों को टकराव के बजाय संवाद का रास्ता अपनाकर ऐसा समाधान निकालना चाहिए, जिससे शिक्षा की गुणवत्ता भी बेहतर हो और छात्रों पर अनावश्यक दबाव भी न पड़े। आखिरकार, शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान बढ़ाना है, बोझ बढ़ाना नहीं।