महाराष्ट्र के साखर सम्राट से लेकर यूपी की गन्ना पर्ची तक, अब इथेनॉल बना नया सियासी-आर्थिक हथियार
भारत में सत्ता का रास्ता अक्सर गांव-खेतों से होकर गुजरने की बात कही जाती है, लेकिन कई बड़े राज्यों में यह रास्ता गन्ने के खेतों के बीच खड़ी चीनी मिलों की चिमनियों से होकर गुजरता है। 1930 के दशक में अंग्रेजी हुकूमत ने शुगर इंडस्ट्री प्रोटेक्शन एक्ट पास किया, जिसने देसी चीनी उद्योग को बढ़ावा दिया। गंगा, यमुना, गंडक और कोसी जैसी बारहमासी नदियों तथा उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी के कारण उत्तर प्रदेश और बिहार गन्ने की खेती के प्राकृतिक केंद्र बन गए। इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन के आंकड़ों के अनुसार 1939-40 तक यूपी और बिहार मिलकर देश की करीब 75 से 80 प्रतिशत चीनी का उत्पादन कर रहे थे, और उस दौर में बिहार देश का ‘चीनी का कटोरा’ कहलाता था।
महाराष्ट्र का सहकारी मॉडल: सत्ता का एटीएम
महाराष्ट्र में गन्ने की खेती के लिए भौगोलिक चुनौतियां कहीं ज्यादा थीं, फिर भी नेताओं ने राजनीतिक रसूख का इस्तेमाल कर नदियों-नहरों का पानी सूखाग्रस्त इलाकों की ओर मोड़ दिया। 1950 में प्रवरानगर में देश की पहली सहकारी चीनी मिल स्थापित हुई, जिसमें किसान ही शेयरधारक थे। समाजशास्त्रीय शोध बताते हैं कि 1960-70 के दशक तक ये मिलें नेताओं के राजनीतिक लॉन्चपैड में बदल गईं। पुणे, बारामती, कोल्हापुर, सतारा और सांगली बेल्ट में शरद पवार ने इस मॉडल को अपनी सियासी ताकत का आधार बनाया, जहां चीनी मिल, जिला सहकारी बैंक, डेयरी और शिक्षा संस्थान एक ही नेटवर्क के तहत काम करते थे। 2014 के बाद भाजपा ने जांच एजेंसियों की कार्रवाई और बेलआउट पैकेज जैसी रणनीतियों के जरिए इस सिंडिकेट में सेंध लगाई, जिसके चलते कई बड़े नेता एनडीए खेमे में शामिल हो गए। हालांकि आलोचकों का कहना है कि सिंडिकेट खत्म नहीं हुआ, बल्कि केवल उसका राजनीतिक झंडा बदल गया।
यूपी में प्राइवेट सेठों का दबदबा
उत्तर प्रदेश में गन्ने की सियासत महाराष्ट्र से बिल्कुल उलट दिशा में चली। यहां चीनी मिलों पर किसानों या नेताओं का नहीं, बल्कि बड़े कॉरपोरेट घरानों का नियंत्रण रहा। यहां की सियासत ‘गन्ना पर्ची’ के इर्द-गिर्द घूमती है—वह पर्ची जो किसान को गन्ना मिल में तौलने का अधिकार देती है। पर्ची में देरी से गन्ना सूखता है और किसान का नुकसान होता है, जिससे मिल बाबुओं और दलालों का प्रभाव बढ़ता है। 2010-11 में उत्तर प्रदेश की 21 सरकारी चीनी मिलों को कौड़ियों के भाव प्राइवेट कंपनियों को बेचे जाने का मामला भी सामने आया था, जिसकी बाद में जांच एजेंसियों ने पड़ताल की।
बिहार: चीनी का कटोरा कैसे बना खंडर
आजादी के बाद गन्ना भुगतान को लेकर मिल मालिकों, किसानों और सरकार के बीच टकराव के चलते बिहार सरकार ने कई निजी मिलों का अधिग्रहण कर लिया। इसके बाद सरकारी लालफीताशाही, भ्रष्टाचार और आधुनिकीकरण की कमी ने इस उद्योग की कमर तोड़ दी। जो बिहार कभी देश की करीब 30 प्रतिशत चीनी का उत्पादन करता था, वह घटकर 2-3 प्रतिशत पर सिमट गया।
इथेनॉल बूम: नया सियासी-कारोबारी खेल
बीते कुछ वर्षों में सरकार की इथेनॉल ब्लेंडिंग नीति ने घाटे में डूबी चीनी मिलों को नया जीवन दिया है। पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने से कच्चे तेल पर निर्भरता घटाने और प्रदूषण कम करने का तर्क दिया जाता है। सरकारी तेल कंपनियां सीधे चीनी मिलों और उनकी डिस्टलरीज से इथेनॉल खरीदती हैं, जिससे इन कंपनियों को गारंटीशुदा और नकद मुनाफा मिलने लगा है। यह मॉडल काफी हद तक ब्राजील की शुगर-एनर्जी लॉबी से प्रेरित बताया जाता है। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी इस नीति के सबसे प्रमुख पैरोकार माने जाते हैं, और विपक्ष का आरोप है कि उनके परिवार से जुड़ी मानस एग्रो इंडस्ट्रीज कंपनी को भी इस नीति का लाभ मिल रहा है। हालांकि गडकरी ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि इथेनॉल क्षेत्र में उनके परिवार की कंपनी की हिस्सेदारी बेहद मामूली है और उनका पारिवारिक चीनी कारोबार इथेनॉल नीति से पहले का है।
किसानों को कितना फायदा?
सरकारी आंकड़ों के अनुसार इथेनॉल से मिलने वाले नकद भुगतान के चलते गन्ने का बकाया भुगतान पहले से तेज हुआ है और 2023-24 सीजन में यह करीब 99 प्रतिशत तक क्लियर हो चुका है। हालांकि आंकड़े यह भी दिखाते हैं कि बीते दस वर्षों में गन्ने के न्यूनतम मूल्य में जहां 60-65 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई, वहीं इथेनॉल बनाने वाली कंपनियों के मुनाफे और शेयर कीमतों में 500 से 1000 प्रतिशत तक इजाफा देखा गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि किसानों को केवल उनका बकाया हक मिला है, जबकि इथेनॉल से पैदा हुआ बड़ा मुनाफा मुख्यतः शुगर मिल्स और कंपनियों के खाते में गया है।