चेकअप न कराने वाले लोगों में अस्पताल भर्ती होने का खतरा तीन गुना ज्यादा समय पर फॉलो-अप की कमी बढ़ा रही आर्थिक बोझ
फ्राइडे संवाद. हेल्थ | भारतीय कंपनियां हर साल कर्मचारियों के हेल्थ बेनिफिट पर करोड़ों रुपए खर्च कर रही हैं, लेकिन सबसे ज्यादा खर्च उसी छोटे समूह पर हो रहा है जो नियमित रूप से हेल्थ चेकअप ही नहीं कराता। औद्योगिक संगठन सीआईआई और मेडिबडी की वर्कफोर्स हेल्थ रीइमेजिंड एडिशन 2026 रिपोर्ट के अनुसार कुल कर्मचारियों में से केवल 25 प्रतिशत ऐसे हैं जिन्होंने कोई हेल्थ चेकअप नहीं कराया, फिर भी यही समूह कंपनियों के 46 प्रतिशत बीमा क्लेम का कारण बनता है। 10,551 कर्मचारियों के डेटा विश्लेषण में पाया गया कि जिन कर्मचारियों ने एक भी सालाना हेल्थ चेकअप नहीं कराया, उनमें अस्पताल भर्ती होने की दर 7.27 प्रतिशत रही, जबकि लगातार तीन साल चेकअप कराने वालों में यह दर सिर्फ 2.41 प्रतिशत रही—यानी चेकअप छोड़ने वालों में भर्ती होने का जोखिम करीब तीन गुना ज्यादा है।
फॉलो-अप की लापरवाही बढ़ा रही जोखिम
रिपोर्ट के मुताबिक चेकअप कराने के बावजूद 52 प्रतिशत कर्मचारी ऐसे हैं जो जोखिम सामने आने के बाद फॉलो-अप ही नहीं करते। इसका सीधा नतीजा यह होता है कि बीमारियां बढ़ती हैं और बाद में महंगे अस्पताल में भर्ती होने की नौबत आ जाती है। रिपोर्ट इसे कर्मचारियों की लापरवाही नहीं, बल्कि मौजूदा सिस्टम डिजाइन की विफलता मानती है। विशेषज्ञों के अनुसार, केवल चेकअप कराना पर्याप्त नहीं है; समय पर परिणामों पर अमल करना ही असली रोकथाम है।
कंपनियों को हो रहा भारी आर्थिक नुकसान
डेलॉय इंडिया के मुताबिक कर्मचारियों की खराब सेहत भारतीय कंपनियों को हर साल करीब 1.1 लाख करोड़ रुपए के नुकसान की वजह बन रही है। इसमें अकेले 51,000 करोड़ रुपए का नुकसान उन कर्मचारियों की वजह से होता है जो दफ्तर आने के बावजूद पूरी क्षमता से काम नहीं कर पाते, जबकि बाकी नुकसान बीमारी के चलते दफ्तर न आने से जुड़ा है। सर्वे में शामिल 459 कंपनियों में से 46 प्रतिशत कंपनियां—खासकर हेल्थकेयर और फार्मा क्षेत्र की—सबसे निचले ‘ब्रेक-फिक्स’ स्तर पर पाई गईं, जबकि आईटी और आईटीईएस क्षेत्र की कंपनियां इस मामले में सबसे आगे रहीं।
कंपनियों को उठाने होंगे ये कदम
रिपोर्ट में कंपनियों के एचआर विभागों को कुछ अहम बदलाव करने की सलाह दी गई है। सबसे पहले कंपनियों को हाई-रिस्क कर्मचारियों की पहचान करनी चाहिए, ताकि समय रहते जरूरी कदम उठाए जा सकें। इसके साथ ही हेल्थ चेकअप के बाद 72 घंटे के भीतर अनिवार्य फॉलो-अप सुनिश्चित किया जाना चाहिए। रिपोर्ट यह भी कहती है कि सेहत के मामले में सफलता योग कैंप की संख्या से नहीं, बल्कि अस्पताल क्लेम और बीमारी कम होने के आंकड़ों से आंकी जानी चाहिए, तभी वास्तविक सुधार संभव होगा।
डिजिटल हेल्थ में भारत आगे
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि भारत में 84 करोड़ से ज्यादा आभा हेल्थ आईडी बन चुकी हैं और ई-संजीवनी सेवा पर 43 करोड़ से अधिक टेलीकंसल्ट हो चुके हैं, जबकि अमेरिका और ब्रिटेन में यह सुविधा अभी भी बिखरी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल हेल्थ ढांचे में भारत की यह बढ़त कर्मचारियों की नियमित निगरानी और समय पर फॉलो-अप सुनिश्चित करने में मददगार साबित हो सकती है, बशर्ते कंपनियां इसका सही इस्तेमाल करना सीखें।