जंतरमंतर का आक्रोश: पेपर लीक नहीं, टूटते भरोसे की चीख भर्ती परीक्षाओं में लीक तो बहाना बनी, असल गुस्सा शिक्षा और रोजगार व्यवस्था की बदहाली पर फूटा
फ्राइडे संवाद. नई दिल्ली | पिछले डेढ़ महीने में दिल्ली के जंतरमंतर पर जो कुछ हुआ, उसे केवल एक और परीक्षा-पेपर लीक विरोधी प्रदर्शन कहकर टाल देना गलत होगा। हजारों की संख्या में देशभर से युवा बिना किसी हथियार, बिना डंडे-पत्थर के इकट्ठा हुए, अनशन हुआ और हफ्तों तक शांतिपूर्ण धरना चला। सतह पर वजह भर्ती परीक्षा का पेपर लीक होना था, लेकिन भीतर जो आग सुलग रही थी, वह बरसों पुरानी थी। युवाओं से पूछा गया तो उनके जवाब साफ थे, यह सिर्फ एक परीक्षा रद्द होने का मसला नहीं, बल्कि पूरी शिक्षा और भर्ती व्यवस्था पर से उठता भरोसा था। यह प्रदर्शन केवल राजधानी तक सीमित नहीं रहा; मुंबई के शिवाजी पार्क से लेकर भोपाल, पटना और कोलकाता तक, छोटे-बड़े शहरों में इसकी गूंज सुनाई दी।
टूटता भरोसा, बिखरता सपना
बीते दस वर्षों में देश में डेढ़ सौ से अधिक बार परीक्षा पेपर लीक होने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं—औसतन हर महीने एक। करोड़ों विद्यार्थियों का भविष्य इससे प्रभावित हुआ है। जिस पीढ़ी के लिए मेहनत और मेरिट के बल पर आगे बढ़ना ही गरीबी और सामाजिक ढांचे की जकड़न से निकलने का इकलौता रास्ता था, उसी रास्ते पर बार-बार सेंध लग रही है। हर साल लाखों छात्र सीमित सरकारी पदों के लिए होड़ में उतरते हैं, जबकि निजी क्षेत्र में भी पर्याप्त रोजगार के अवसर नहीं बन पाए हैं। कोचिंग संस्थानों की बढ़ती फीस, केंद्रीकृत परीक्षा प्रणाली और शैक्षणिक संस्थानों की सीमित स्वायत्तता ने भरोसे को और कमजोर किया है। ग्रामीण और वंचित तबकों के विद्यार्थियों के लिए यह संकट कहीं अधिक गहरा है, जहां शिक्षकों की भारी कमी और बुनियादी ढांचे के अभाव में विज्ञान जैसे विषय पढ़ना भी दूर का सपना बन जाता है।
सख्ती से नहीं, सुधार से मिलेगा हल
सरकार की ओर से जो जवाब सामने आया, वह सुधार का नहीं बल्कि दंड का रास्ता था—सजा की अवधि बढ़ाकर व्यवस्था को दुरुस्त करने का दावा। लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल सजा बढ़ाने से लीक रुकेंगे, जब तक कोचिंग संस्थानों और भर्ती तंत्र के बीच का गठजोड़ बना रहेगा? विशेषज्ञों के अनुसार, जब तक शिक्षण संस्थानों को प्रवेश और पाठ्यक्रम तय करने की वास्तविक स्वायत्तता नहीं मिलेगी और परीक्षा प्रणाली का विकेंद्रीकरण नहीं होगा, तब तक ढांचागत सुधार अधूरा ही रहेगा। उच्च शिक्षण संस्थानों में शिक्षकों के हजारों पद वर्षों से रिक्त पड़े हैं, जो इस संकट की गहराई को दिखाने के लिए काफी है।
प्रदर्शन पर सख्ती, जवाबदेही पर चुप्पी
प्रदर्शन के दौरान बल प्रयोग की घटनाओं ने मामले को और गंभीर बना दिया। लाठीचार्ज, आंसू गैस और पैलेट गन के इस्तेमाल की तस्वीरें सामने आईं, जिनमें महिलाओं और नाबालिग प्रदर्शनकारियों तक पर बल प्रयोग की बात कही गई। इंटरनेट सेवाएं बाधित करने और मेट्रो स्टेशन बंद करने जैसे कदमों ने भी सवाल खड़े किए। एक मंत्री के इस्तीफे से मसला सुलझा हुआ मान लिया गया, जबकि प्रदर्शनकारियों के साथ हुए बर्ताव की जवाबदेही तय करने की मांग अब भी अनुत्तरित है। यह ध्यान रखने योग्य है कि यह विश्लेषण उन नेताओं और टिप्पणीकारों के दृष्टिकोण पर आधारित है जिन्होंने सरकार की आलोचना की; सरकार और पुलिस प्रशासन का पक्ष भी इस बहस का उतना ही जरूरी हिस्सा है, जिसे आगे की रिपोर्टिंग में शामिल किया जाना चाहिए।
आगे की राह
जंतरमंतर का यह आंदोलन भले ही फिलहाल थम गया हो, लेकिन इसकी अनुगूंज देश के विभिन्न हिस्सों में अब भी सुनाई दे रही है। यह पीढ़ी न तो परंपरागत मीडिया पर भरोसा करती है और न ही राजनीतिक बहानों से संतुष्ट होती है। इसकी मांग सीधी है; पारदर्शी परीक्षा प्रणाली, रोजगार के वास्तविक अवसर और शिक्षा में जवाबदेही। सरकार, विपक्ष और समाज के सामने अब यह जिम्मेदारी है कि इस गुस्से को केवल एक अस्थायी आंदोलन मानकर नजरअंदाज न करें, बल्कि इसे व्यवस्थागत सुधार की दिशा में एक अवसर के रूप में देखें।
(जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने एक मीडिया मंच को दिए गए साक्षात्कार में कहा।)