मौलाना अबुल कलाम आज़ाद या अबुल कलाम गुलाम मुहियुद्दीन (11 नवंबर, 1888 – 22 फरवरी, 1958) एक प्रसिद्ध भारतीय मुस्लिम विद्वान थे। वे कवि, लेखक, पत्रकार और भारतीय स्वतंत्रता सेनानी थे। स्वतंत्रता के बाद वे भारत के पहले शिक्षा मंत्री बने। उनके भाषण आज भी कहीं ना कहीं हम सब को जिंदगी में कुछ बेहतर करने के लिए प्रेरित करते हैं। लेख में हम आपके साथ उनके भाषण का एक अंश साझा कर रहे हैं:
“ज़िंदगी में हर जिम्मेदारी अपने साथ कुछ तक़ाज़े लेकर आती है, और इन तक़ाज़ों को पूरा करना ही इंसान की असली परीक्षा होती है। जो व्यक्ति ठोकरें खाता है, वही आगे बढ़ता है। जो रास्ते पर चलते हैं, वही गिरते भी हैं और संभलते भी हैं। जबकि जो डरकर बैठ जाते हैं, उन्हें न ठोकर लगती है, न ही मंज़िल मिलती है। यह सच है कि हर इंसान तकलीफ़ों और परेशानियों से बचना चाहता है, लेकिन जिम्मेदारी उठाने वाले के लिए मुश्किलें अनिवार्य हैं। अगर हम अपनी किस्मत के मालिक हैं और मैदान में खड़े हैं, तो आज़माइशें भी ज़रूर आएंगी। यही इंसान की असली परख होती है — कि वह मुसीबतों के सामने झुकता है या डटकर खड़ा रहता है। मुश्किलें किसी की हार का सबब नहीं, बल्कि उसकी ताकत का सबूत होती हैं। गिरना बुरा नहीं, गिरकर उठना और आगे बढ़ना ही हिम्मत कहलाता है। जो इंसान ज़िंदा है, जिसकी रगों में गर्म खून दौड़ रहा है, उसके लिए बीमारियाँ, ठोकरें और परेशानियाँ जीवन का हिस्सा हैं।
ज़िंदगी का असली मतलब यही है — बोझ उठाना और उसे हिम्मत से निभाना। डरकर पीछे हटना नहीं, बल्कि मर्दानगी के साथ जिम्मेदारियों को निभाना ही असली इंसानियत है। जब तक इंसान संघर्ष करता है, तब तक वह ज़िंदा है। यही जज़्बा उसे मज़बूत बनाता है और यही हिम्मत उसे मंज़िल तक पहुँचाती है। हर ठोकर, हर तकलीफ़ और हर परीक्षा हमें यही सिखाती है कि डरना नहीं — क्योंकि ज़िंदगी उसी की है जो गिरकर भी उठना जानता है।”
