आलिम-हाफिज़ के साथ डॉक्टर-टीचर बनाने पर भी जोर देने की जरूरत
फ्राइडे संवाद | खुर्शीद अहमद
इस्लामी इतिहास को पढ़ने से पता चलता है कि जब इस्लामी सभ्यता अपने उरूज पर थी, उस दौर में मदरसों और इल्मी संस्थानों में शिक्षा का स्तर काफी व्यापक था। वहां धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ गणित, चिकित्सा, खगोल विज्ञान, भूगोल, दर्शन और अन्य विषयों का अध्ययन भी किया जाता था। यही वजह थी कि उस दौर में हाफिज़ और आलिम के साथ वैज्ञानिक, चिकित्सक, गणितज्ञ, भूगोलवेत्ता, शोधकर्ता और विचारक भी सामने आए।
आज अगर हम अपने मौजूदा मदरसा सिस्टम की तुलना उस व्यापक शिक्षा परंपरा से करें तो हमें आत्ममंथन की जरूरत है। सवाल यह है कि आज हमारे मदरसों से किस तरह की शैक्षणिक और पेशेवर तैयारी के साथ बच्चे निकल रहे हैं?
बच्चे सिर्फ नाज़रा या हिफ्ज़ के लिए मदरसों में क्यों आएं?
मदरसों से मोहब्बत है और उनकी अहमियत है तो हमें यह भी सोचना होगा कि मदरसे से जुड़े जिम्मेदार लोगों के बच्चे अक्सर अच्छे स्कूलों में पढ़ते हैं, जबकि गांवों और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को मदरसों में लाकर मुख्य रूप से नाज़रा, हिफ्ज़ या दीनी तालीम दी जाती है। सवाल यह नहीं है कि दीनी तालीम क्यों दी जा रही है। सवाल यह है कि क्या दीनी तालीम के साथ आधुनिक शिक्षा और रोजगार के अवसर भी दिए जा रहे हैं?
आज का दौर कड़ी प्रतिस्पर्धा और डिजिटल शिक्षा का दौर है। ऐसे में सिर्फ कुछ बच्चों को छोड़कर क्या मौजूदा व्यवस्था से निकलने वाले बच्चे डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक, प्रशासनिक अधिकारी या अन्य पेशेवर क्षेत्रों में आसानी से आगे बढ़ पाएंगे? इस सवाल पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।
गांव में रहकर भी हासिल हो सकती है दीनी तालीम
आज ऑनलाइन शिक्षा ने बहुत कुछ आसान कर दिया है। आईएएस-आईपीएस से लेकर दूसरे प्रतियोगी परीक्षाओं तक की तैयारी घर बैठे ऑनलाइन की जा सकती है। इसी तरह दीनी शिक्षा के क्षेत्र में भी ऑनलाइन माध्यम का इस्तेमाल बढ़ाया जा सकता है।
मिसाल के तौर पर India Islamic Academy Deoband (IIAD) और E-Darul Uloom Al-Islamia Deoband जैसे संस्थानों के ऑनलाइन शिक्षा मॉडल का अध्ययन किया जा सकता है।
अगर गांव के बच्चे अपने गांव में रहकर ऑनलाइन माध्यम से हिफ्ज़ या आलिम का कोर्स कर सकते हैं और बाकी समय स्कूल जाकर आधुनिक शिक्षा हासिल कर सकते हैं, तो इससे उन्हें दोनों तरह की शिक्षा का अवसर मिल सकता है। गांव की मस्जिद के इमाम या कोई शिक्षित और जिम्मेदार व्यक्ति इस व्यवस्था में स्थानीय स्तर पर सहयोग कर सकता है।
आलिम-हाफिज़ के साथ डॉक्टर और शिक्षक भी बनें
अगर हम गांवों के बच्चों को मदरसों में लाना चाहते हैं तो उन्हें सिर्फ आलिम या हाफिज़ बनाने तक सीमित नहीं रखना चाहिए। उन्हें डॉक्टर, शिक्षक, इंजीनियर, टेक्निकल एक्सपर्ट या किसी हुनरमंद पेशेवर के रूप में तैयार करने की दिशा में भी काम होना चाहिए।
इससे बच्चे अपनी जिंदगी बेहतर तरीके से गुजार सकेंगे और मदरसों की सामाजिक भूमिका भी मजबूत होगी। दीनी तालीम और आधुनिक शिक्षा को एक-दूसरे का विरोधी मानने के बजाय दोनों को साथ लेकर चलने की जरूरत है।
दीनी कामों के लिए मजबूत आर्थिक मॉडल जरूरी
आखिरी और सबसे अहम सवाल आर्थिक व्यवस्था का है। आखिर कब तक मदरसों और दीनी संस्थानों का संचालन केवल चंदे और गोठ के भरोसे चलता रहेगा? चंदा देना गलत नहीं है, लेकिन अगर लगातार खर्च के लिए चंदा ही जुटाना पड़े तो यह स्थायी समाधान नहीं हो सकता। चंदे से मिलने वाली राशि का एक हिस्सा ऐसी संपत्तियों या आय के स्रोत तैयार करने में लगाया जा सकता है, जिससे भविष्य में संस्थान की नियमित जरूरतों का कुछ हिस्सा खुद पूरा हो सके।
मदरसों और दीनी संस्थानों के लिए मजबूत बिजनेस मॉडल, वक्फ आधारित आय, पारदर्शी वित्तीय व्यवस्था और स्थायी आय के स्रोत विकसित करने पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। आखिर हमारा मकसद सिर्फ मदरसे चलाना नहीं, बल्कि ऐसी पीढ़ी तैयार करना होना चाहिए जो दीनी इल्म के साथ आधुनिक शिक्षा, हुनर और रोजगार के मैदान में भी मजबूती से खड़ी हो सके। यही वक्त की जरूरत है और इसी दिशा में गंभीर सोच की शुरुआत होनी चाहिए।