अमेरिकी-जर्मन वैज्ञानिकों की खोज से अंधापन और पार्किंसंस के इलाज की उम्मीद बढ़ी
फ्राइडे संवाद. हेल्थ
इस बार चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार अमेरिका और जर्मनी के तीन वैज्ञानिकों को दिया गया है। ये वैज्ञानिक हैं कार्ल डेसरॉथ (54), पीटर हेगेमान और जॉर्ज नेगल (73)। इन्होंने दिमाग में अलग-अलग नर्व सेल्स की एक्टिविटी को रोशनी से ‘ऑन’ या ‘ऑफ’ करने की तकनीक पर शोध किया था। उनका काम ‘लाइट-गेटेड आयन चैनल्स’ और ‘ऑप्टोजेनेटिक्स’ से जुड़ा है। नोबेल समिति ने कहा कि यह तरीका अब दुनिया भर में दिमाग के कई रहस्यों को समझने के लिए इस्तेमाल हो रहा है।
क्या है ऑप्टोजेनेटिक्स
स्टैनफोर्ड के डेसरॉथ, बर्लिन के हेगेमान और वुर्जबर्ग के नेगल की खोज ऑप्टोजेनेटिक्स ने न्यूरोसाइंस की दिशा बदल दी है। इस तकनीक में प्रकाश-चालित ऐसे ‘स्विच’ मिलते हैं, जिनसे दिमाग की नर्व सेल्स और सर्किट्स को नियंत्रित कर ब्रेन फंक्शन, व्यवहार और बीमारियों को समझा जा सकता है। आसान भाषा में कहें तो वैज्ञानिक अब रोशनी की मदद से दिमाग के किसी खास हिस्से की कोशिकाओं को चालू या बंद कर यह देख सकते हैं कि उसका असर शरीर और व्यवहार पर क्या पड़ता है।
हरे शैवाल से शुरू हुई खोज
इसकी शुरुआत हेगेमान द्वारा हरे शैवाल के रोशनी की ओर तैरने के रहस्य को सुलझाने से हुई। हेगेमान और नेगल ने एक ऐसे प्रोटीन की खोज की, जो नीली रोशनी पड़ने पर आयन चैनल खोलकर इलेक्ट्रिकल हलचल पैदा करता है। डेसरॉथ ने इसी जीन का उपयोग कर जीवित चूहों के दिमाग में नर्व सेल्स के लिए लाइट-कंट्रोल्ड स्विच तैयार किए। इस तरह एक शैवाल का रहस्य सुलझाने की कोशिश दिमाग की कार्यप्रणाली समझने का बड़ा औजार बन गई। आज यही तकनीक दुनिया भर की प्रयोगशालाओं में दिमाग के सर्किट्स और उनसे जुड़ी बीमारियों पर शोध का आधार बन रही है।
अंधापन: लौट सकती है रोशनी
इस खोज से दृष्टिहीनों को रोशनी मिलने की उम्मीद बढ़ी है। आंखों की रेटिना कोशिकाओं को प्रकाश-संवेदनशील बनाकर उन लोगों की रोशनी लौटाई जा सकेगी, जो किसी बीमारी की वजह से दृष्टिहीन हो गए हैं। यानी जो कोशिकाएं खुद रोशनी को नहीं पकड़ पातीं, उन्हें इस तकनीक से प्रकाश के प्रति संवेदनशील बनाने की दिशा में काम हो सकता है।
पार्किंसंस: कंपन पर नियंत्रण
पार्किंसंस रोग में शरीर में कंपन और अन्य लक्षण दिखाई देते हैं। दिमाग के विशिष्ट न्यूरॉन्स को ऑन-ऑफ करके शरीर के कंपन और लक्षणों को नियंत्रित किया जा सकेगा। यह तकनीक इस दिशा में नई उम्मीद जगाती है।
डिप्रेशन-चिंता को समझने में मदद
इस खोज से वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिलेगी कि मानसिक विकारों के दौरान दिमाग का कौन सा हिस्सा प्रभावित होता है। डिप्रेशन और चिंता जैसी समस्याओं के कारणों की सटीक पहचान हो सके, तो इलाज के नए रास्ते खुल सकते हैं।
आगे की राह
इन संभावनाओं को मरीजों तक इलाज के रूप में पहुंचाने के लिए अभी और शोध व परीक्षण की जरूरत होगी। फिर भी दिमाग के रहस्यों को समझने में यह खोज एक बड़ा कदम मानी जा रही है। नोबेल पुरस्कारों की घोषणा का सिलसिला शुरू हो चुका है और चिकित्सा का यह सम्मान इस बार न्यूरोसाइंस के नाम रहा है। इस साल पुरस्कार की राशि 11.55 करोड़ रुपए है।