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दुनिया और आख़िरत की कामयाबी के लिए पढ़ते रहना जरूरी है।

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रमज़ान स्पेशल: दुनिया भर में इबादत का माहौल

By Friday Sanwad
February 13, 2026 3 Min Read
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रमज़ान का पवित्र महीना जैसे-जैसे करीब आता है, पूरी दुनिया के मुसलमान इबादत व रोज़ो की तैयारी में जुट जाते हैं। खास तौर पर संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में इस महीने का अलग ही रंग दिखाई देता है। मस्जिदों की रौनक बढ़ जाती है, बाज़ार सज जाते हैं, ‘फ़ानूस’ (लालटेन) से गलियां जगमगा उठती हैं और कामकाजी घंटों व स्कूल टाइमिंग में भी बदलाव कर दिए जाते हैं, ताकि लोग आसानी से रोज़ा रख सकें और इबादत कर सकें। खगोलीय गणनाओं के अनुसार हर साल रमज़ान की शुरुआत चाँद दिखने पर निर्भर करती है। यूएई में आधिकारिक घोषणा मून साइटिंग कमेटी करती है। इसी वजह से कभी-कभी तारीख एक दिन आगे-पीछे हो जाती है। यह अनिश्चितता भी इस महीने की खूबसूरती का हिस्सा है, क्योंकि पूरा समाज चाँद देखने के इंतज़ार में रहता है।

दिलचस्प है 33 साल का चक्र

रमज़ान की एक दिलचस्प खासियत उसका 33 साल का चक्र है। इस्लामी (हिजरी) कैलेंडर 354 या 355 दिनों का होता है, जो ग्रेगोरियन कैलेंडर से लगभग 10–12 दिन छोटा है। इसी कारण रमज़ान हर साल पीछे खिसकता रहता है और लगभग 33 साल में सभी मौसमों—सर्दी, गर्मी, बसंत और पतझड़—का पूरा चक्र पूरा कर लेता है। यही वजह है कि कभी रोज़े छोटे होते हैं, तो कभी 15–16 घंटे या उससे भी ज्यादा लंबे। अरब अमीरात में रोज़े औसतन 12 से 14 घंटे के बीच रहते हैं, लेकिन दुनिया के कुछ उत्तरी देशों जैसे नॉर्वे, स्वीडन, आइसलैंड और ग्रीनलैंड में रोज़ा 18 से 20 घंटे तक लंबा हो सकता है। वहीं अफ्रीका और दक्षिणी गोलार्ध के देशों में यह अवधि कम होती है।
भारत में रोजे लगभग 12 घंटे और 45 मिनट पर शुरू होंगे। महीने के आगे बढ़ने के साथ-साथ दिन के समय रोजे की अवधि धीरे-धीरे बढ़ती जाएगी।
इससे साफ है कि रमज़ान सिर्फ एक धार्मिक महीना नहीं, बल्कि वैश्विक अनुभव भी है।

रोज़ा रखना इस्लाम में फर्ज़

इतिहास पर नजर डालें तो रमज़ान की परंपरा इस्लाम से पहले भी अरब समाज में मौजूद थी, लेकिन रोज़ा रखना इस्लाम में फर्ज़ किया गया। समय के साथ यह महीना आत्मसंयम, दान और भाईचारे का प्रतीक बन गया। अरब में इफ्तार टेंट, चैरिटी कैंपेन और गरीबों के लिए मुफ्त भोजन वितरण आम बात है। बड़ी कंपनियाँ और सामाजिक संस्थाएँ जरूरतमंदों की मदद के लिए विशेष कार्यक्रम चलाती हैं। दुनिया भर में भी रमज़ान सांस्कृतिक मेल-मिलाप का जरिया बन चुका है। अमेरिका में व्हाइट हाउस में भी ऐतिहासिक रूप से रमज़ान डिनर आयोजित किए गए। यूरोप, एशिया और अफ्रीका में मुस्लिम समुदाय अपने-अपने तरीके से इस महीने को मनाते हैं। सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए अब इफ्तार और तरावीह की झलकियाँ पूरी दुनिया में साझा की जाती हैं।

2030 में एक ही साल में दो रमज़ान

आने वाले वर्षों में रमज़ान से जुड़ी कुछ अनोखी घटनाएँ भी देखने को मिलेंगी। उदाहरण के तौर पर 2030 में एक ही साल में दो रमज़ान आने की संभावना है—एक जनवरी में और दूसरा दिसंबर में। यह खगोलीय गणनाओं और चंद्र कैलेंडर के अंतर का नतीजा है। आखिरकार, रमज़ान सिर्फ भूखे-प्यासे रहने का नाम नहीं है, बल्कि आत्मशुद्धि, सब्र, इंसानियत और दूसरों के दर्द को समझने का महीना है। यूएई से लेकर दुनिया के हर कोने तक, यह महीना लोगों को जोड़ने और दिलों में रोशनी भरने का काम करता है। सच मायनों में, रमज़ान इंसान को बेहतर इंसान बनने की सीख देता है।

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Friday Sanwad

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