नई दिल्ली। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (ए.आई.एम.पी.एल.बी.) के महासचिव मौलाना फजलुर रहीम मुजद्दिदी ने सिविल सेवाओं और न्यायपालिका में अल्पसंख्यक समुदायों, विशेषकर मुसलमानों के कम प्रतिनिधित्व पर गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में हर समुदाय को जनसंख्या के अनुपात में भागीदारी मिलनी चाहिए।
आंकड़े बयां करते हैं असंतुलन
मौलाना मुजद्दिदी ने बताया कि देश में मुसलमानों की आबादी 18-20 प्रतिशत होने के बावजूद सिविल सेवाओं में उनकी हिस्सेदारी मात्र 2-3 प्रतिशत है। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में यह आंकड़ा 1 प्रतिशत से भी कम है। इसके विपरीत, अन्य समुदायों का प्रतिनिधित्व उनकी जनसंख्या से कहीं अधिक है।
नीतियों पर सीधा असर
उन्होंने कहा कि शिक्षा, रक्षा, वित्त और विदेश नीति जैसे महत्वपूर्ण फैसले उन्हीं लोगों द्वारा लिए जाते हैं जो इन संस्थानों में मौजूद होते हैं। यदि किसी समुदाय का प्रतिनिधि निर्णय की “टेबल” पर नहीं है, तो वह अपने हितों की प्रभावी रक्षा नहीं कर सकता।
युवाओं से अपील
मौलाना मुजद्दिदी ने स्वीकार किया कि बीते 60-70 वर्षों में मुसलमानों ने सिविल सेवाओं को पर्याप्त प्राथमिकता नहीं दी, जिसका खामियाजा आज भुगतना पड़ रहा है। उन्होंने युवाओं से अपील की कि सिविल सेवाओं को केवल सरकारी नौकरी न समझें, बल्कि इसे देश सेवा और समाज सेवा का माध्यम मानें। उन्होंने कहा, “ईमानदारी और निष्ठा के साथ यदि सिविल सेवाओं में प्रवेश किया जाए, तो न केवल देश का भला होगा, बल्कि समुदाय के हितों की भी बेहतर रक्षा हो सकेगी।”
