सूचना की लड़ाई बनी लोकतंत्र की सबसे बड़ी लड़ाई: नोबेल विजेता मारिया रेसा
पेरिस में आयोजित ‘मीडिया एंड डेमोक्रेसी समिट’ में बोलीं फिलीपींस की पत्रकार, कहा—झूठ को सच से अधिक ताकत मिलने से गहराया संकट
नोबेल शांति पुरस्कार विजेता और फिलीपींस के स्वतंत्र समाचार मंच ‘रैप्लर’ की सह-संस्थापक मारिया रेसा ने हाल ही पेरिस में आयोजित ‘मीडिया एंड डेमोक्रेसी समिट’ में पत्रकारिता और सत्य की रक्षा को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि आज दुनिया सूचना के ऐसे दौर में पहुंच चुकी है, जहां झूठ को सच से कहीं अधिक ताकत मिल रही है, और यही आज लोकतंत्र के सामने सबसे बड़ी चुनौती बन गई है। मारिया रेसा ने कहा कि वर्षों पहले पत्रकारिता का सबसे बड़ा काम सत्ता से सवाल पूछना होता था, लेकिन आज उससे भी बड़ी चुनौती यह साबित करना हो गई है कि सच अभी भी अस्तित्व में है। उन्होंने बताया कि यह समस्या किसी एक व्यक्ति के झूठ बोलने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस पूरी डिजिटल व्यवस्था की देन है जो झूठ को तेजी से फैलाने के लिए बनाई गई है। उनके अनुसार डिजिटल मंचों का आर्थिक मॉडल सही जानकारी देने पर नहीं, बल्कि उपयोगकर्ताओं का ध्यान अधिक से अधिक देर तक बांधे रखने पर टिका है, जिसके चलते गुस्सा, डर और नफरत फैलाने वाली सामग्री को एल्गोरिदम तेजी से आगे बढ़ाते हैं।
झूठ, सच की तुलना में कई गुना तेजी से फैलता है
उन्होंने एक शोध का हवाला देते हुए कहा कि झूठ, सच की तुलना में कई गुना तेजी से फैलता है, और जब यह गति इतनी अधिक हो जाए कि सत्य पीछे छूट जाए, तो नागरिकों के लिए सही निर्णय लेना मुश्किल हो जाता है, जबकि लोकतंत्र की पूरी व्यवस्था इसी पर टिकी है कि लोग तथ्यों के आधार पर फैसले लें। अपने अनुभव साझा करते हुए मारिया रेसा ने बताया कि जब उनके समाचार मंच रैप्लर ने फिलीपींस में सत्ता से सवाल पूछे और भ्रष्टाचार व दुष्प्रचार का दस्तावेजीकरण किया, तो उन्हें चुप कराने के लिए कई कानूनी मुकदमे दर्ज किए गए, कर कानूनों का सहारा लिया गया और विदेशी स्वामित्व जैसे आरोप लगाए गए। उन्होंने इसे आधुनिक दौर का नया सेंसरशिप मॉडल बताया, जिसमें पत्रकारों को सीधे जेल भेजने के बजाय मुकदमों, आर्थिक दबाव और ऑनलाइन दुष्प्रचार के जाल में उलझाकर थका दिया जाता है, ताकि वे खुद ही सवाल पूछना बंद कर दें। उन्होंने कहा कि ऐसी लड़ाई कोई अकेला पत्रकार नहीं जीत सकता, इसके लिए नागरिकों, समाज, वकीलों, पत्रकार संगठनों और लोकतांत्रिक संस्थाओं की साझा ताकत जरूरी है।
स्वतंत्र पत्रकारिता का आर्थिक आधार ही खतरे में
मारिया रेसा ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि यदि आज का इंटरनेट झूठ और दुष्प्रचार से भरा है, तो उसी सामग्री पर प्रशिक्षित एआई भविष्य में कैसी दुनिया रचेगा, यह बड़ा सवाल है। उन्होंने यह भी कहा कि पत्रकारों व समाचार संस्थानों की वर्षों की मेहनत से तैयार विश्वसनीय सामग्री अब बिना उचित अनुमति या प्रतिफल के एआई मॉडल बनाने में इस्तेमाल हो रही है, जिससे स्वतंत्र पत्रकारिता का आर्थिक आधार ही खतरे में पड़ सकता है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि तकनीक स्वयं न लोकतांत्रिक होती है और न तानाशाही, सवाल यह है कि उसे कौन और किस उद्देश्य से नियंत्रित कर रहा है। उनके शब्दों में यदि तथ्य नहीं होंगे तो सत्य नहीं होगा, सत्य नहीं होगा तो विश्वास नहीं होगा, और विश्वास न होने पर साझा वास्तविकता के साथ लोकतंत्र भी नहीं बचेगा। मारिया रेसा ने उम्मीद जताते हुए कहा कि दुनिया भर में ऐसे पत्रकार और नागरिक मौजूद हैं जो कठिन परिस्थितियों में भी सच का साथ दे रहे हैं, लेकिन यह उम्मीद तभी सार्थक होगी जब सभी यह स्वीकार करें कि सूचना की लड़ाई अब लोकतंत्र की सबसे बड़ी लड़ाई बन चुकी है।