होर्मुज संकट के बीच भारत की नई ऊर्जा रणनीति: यूएई-ओमान से समुद्र के नीचे बिछेगी तेल-गैस पाइपलाइन 3,450 मीटर की गहराई सबसे बड़ी चुनौती, पूरी परियोजना में लगेंगे 5 से 7 साल
फ्राइडे संवाद. दुबई/नई दिल्ली
होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव के बीच भारत ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए नई रणनीति पर काम कर रहा है। इसके तहत भारत और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के बीच समुद्र के नीचे तेल और गैस पाइपलाइन बिछाने की तैयारी की जा रही है।
केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने यूएई के विदेश व्यापार मंत्री थानी बिन अहमद अल जेउदी से मुलाकात के बाद इस योजना की पुष्टि की। सरकार ने ओमान-यूएई से भारत तक समुद्र के नीचे पाइपलाइन परियोजना को प्राथमिकता में रखा है।
क्या है MEIDP परियोजना
MEIDP (मिडिल ईस्ट टू इंडिया डीप-वॉटर पाइपलाइन) के तहत पाइपलाइन ओमान और यूएई के तट से शुरू होकर अरब सागर के नीचे से गुजरते हुए गुजरात और महाराष्ट्र के तट तक पहुंच सकती है। जून में सरकार ने इसे निजी प्रोजेक्ट बताया था। शुरुआत में इसमें सिर्फ गैस पाइपलाइन की योजना थी, लेकिन अब समुद्र के रास्ते कच्चा तेल लाने की संभावना पर भी तकनीकी अध्ययन शुरू हो गया है।
पेट्रोलियम मंत्रालय के निर्देश पर सरकारी कंपनियां परियोजना की विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर रही हैं। इसमें गहरे समुद्र में पाइपलाइन बिछाने की तकनीक, लागत और सुरक्षा समेत दूसरे पहलुओं की जांच की जाएगी।
क्यों पड़ी इस पाइपलाइन की जरूरत
भारत अपनी जरूरत का करीब 88 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। देश में आने वाली आधी से ज्यादा LPG और LNG भी कतर और यूएई से समुद्री रास्ते से जहाजों के जरिए आती है। ऐसे में होर्मुज क्षेत्र में तनाव भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए बड़ी चिंता बन जाता है, इसीलिए सरकार वैकल्पिक रास्ते तैयार करना चाहती है।
सबसे बड़ी चुनौती समुद्र की गहराई
इस परियोजना में सबसे बड़ी इंजीनियरिंग चुनौती समुद्र में करीब 3,450 मीटर की गहराई तक पाइपलाइन बिछाना है। इतनी गहराई में पानी का दबाव काफी ज्यादा होता है। पाइपलाइन को सुरक्षित रखना, समुद्र तल की चट्टानों और खाइयों के बीच रास्ता बनाना और भविष्य में इसकी मरम्मत करना भी बड़ी तकनीकी चुनौतियां होंगी।
सीधी सप्लाई से घटेगा खर्च और जहाजों पर निर्भरता
सीधे ओमान, यूएई, कतर और सऊदी अरब के गैस और तेल भंडार से आपूर्ति मिलने पर समुद्री जहाजों पर निर्भरता कम हो सकती है। इससे तेल और गैस के परिवहन और बीमा पर होने वाला खर्च घट सकता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में अचानक तेल और गैस की कीमत बढ़ने पर भारत पर पड़ने वाला दबाव भी कम हो सकता है।
3 किमी पाइपलाइन का परीक्षण
परियोजना विकसित करने वाली संस्था साउथ एशिया गैस एंटरप्राइज ने करीब ₹25 करोड़ की लागत से लगभग 3 किलोमीटर पाइपलाइन बिछाकर परीक्षण किया है। सभी शर्तें पूरी होने के बाद पूरी परियोजना के निर्माण में करीब 5 से 7 साल लगने का अनुमान है।
साफ है कि यह परियोजना भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से एक बड़ा कदम साबित हो सकती है, हालांकि इसकी राह में तकनीकी और आर्थिक चुनौतियां कम नहीं हैं।